अतिरिक्त जिला कलेक्टर टोंक (राजस्थान) श्रीमान सूरज सिंह नेगी वर्तमान में निजी सहायक संबंधित मंत्री महोदय सचिवालय जयपुर द्वारा राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलाई जा रही पत्र लेखन विधा को पुनर्जीवित करने के लिए विगत दस वर्षों से एक मुहिम 'पाती अपनों को' व्हाट्सअप समूह बनाकर चलाई जा रही है। वर्तमान में पूर्व की तरह पत्र नहीं लिखे जा रहे हैं। अब उनका स्थान व्हाट्सअप ने ले लिया है पर एक बात है पहले जब डाकिया पत्र लेकर घर आता था तो डाक लेन के लिए सारे घर वाले दौड़ पड़ते थे। उसकी मान मनुहार की जाती थी। प्राप्त पत्र को सारे परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर पढ़ते, सुनते थे। कई कई सालों तक उन पत्रों को सहज कर रखते थे।जब मन करता था पत्र को संदुक में से निकालकर पढ़ते थे। कितने मनोभाव जुड़े रहते थे उन पत्रों से। पत्र पढ़ने वाला उन भावों में खो जाता था। पढ़ते समय उसके सामने लिखने वाले के मन के भाव व उसका चेहरा आंखों में बस जाता था, पर अब यह सब समाप्त हो गया। केवल कुछ ही मिनटों में मोबाइल में आये संदेशों को अंगुली और अंगूठे की सहायता से कुछ ही समय में हमेशा-हमेशा के लिए डिलीट कर दिया जाता है। नई पीढ़ी उन सब चीजों से अनभिज्ञ न रहे इसके लिए कलम कागज से हाथ द्वारा पत्र लेखन विधा को पुनर्जीवित करने के नेगी सर ने मुहिम छेड़ी, जिसमें हजारों काॅलेज विद्यार्थी, स्कूली बच्चे व देश-विदेश से कई ख्याति प्राप्त साहित्यकार, लेखक और कविगण जुड़ते गये। धीरे-धीरे प्रयास सदृश यह छोटा-सा पौधा आज वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। आज पाती अपनों को समूह के द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखी पातियो में से चयनित पत्रों की लगभग उन्नीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनके नाम निम्नलिखित हैं - मां की पाती बेटी के नाम, पत्र पिता के, पाती बच्चों की, एक पाती मीत को, शिक्षक को पाती, प्रकृति की पुकार, बापू की चिट्ठी, माटी की पुकार, पाती स्मृतियों के झरोखे से, पाती यादों के गलियारे से, गौरया के नाम पाती, डाकिया बाबू को पाती आदि। इनमें से कुछ के टाइटल्स इस प्रकार हैं।
मां की गोद से ऊंचाइयों तक गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..." यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा। जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है। मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।" यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया। लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...



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