'तीर्थ' शब्द मूलतः संस्कृत भाषा से लिया गया है जिससे आशय एक शुद्ध और पवित्र स्थान से है। यहां पर साथ साथ यह भी समझ लें कि सभी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व वाले स्थान तो तीर्थ कहे जाएंगे, जबकि ऋषियों और सिद्धों की साधना-भूमि रहे स्थान तीर्थस्थल। ऐसे स्थान महान व आध्यात्मिक तथा तप:शक्ति के अक्षय केंद्र होते हैं। तीर्थ अर्थात् ऐसे स्थान जो पुनीत हों और अपने यहां आने वालों में भी पवित्रता का संचार कर सकें। कविवर कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने अपनी कल्पनाशीलता से उत्तम तीर्थ को समझा और उस पर भी लिखा। आइए उनके इस सार्थक प्रयास का आनंद लेते हैं।
मानव का पावन हृदय ही एक उत्तम तीरथ होता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।
होता है जब जन्म मनुष्य का उसका हृदय पावन होता।
भरी हुई निश्छलता होती इसमें ही वो जगता सोता।
धीरे-धीरे बड़ा हुआ तो झूठ, कपट, छल से घिर जाता।
किये हुए विधि से वायदों से धरती पर आकर फिर जाता।
दुष्कर्मों की निज जीवन में बेल सदा मिलता बोता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।१।।
पावन भावों को जो मानव संजो सदा हृदय में रखता।
कोई अधर्मी कर्म भूल से नहीं कभी जीवन में करता।
फिर तो उसको नहीं जरूरत कभी किसी तीरथ जाने की।
पावन गंगा यमुना में भी नहीं जरूरत है नहाने की।
ऐसे मानव का घर मथुरा, काशी. वृन्दावन होता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।२।।
मानव के पावन हृदय को ईश्वर अपना वास मानता।
किसका हृदय तीरथ जैसा यह केवल भगवान जानता।
हृदय के पावन तीरथ को नर कर बैठा आज अपावन।
उसको माया ठगनी लगती निज जीवन में सदा लुभावन।
सोचो क्या तीरथ में मानव धर्म-कर्म में ही खोता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।३।।
तीरथ जो पावन होते हैं वो ही मन निर्मल करते हैं।
सुखी वही जो तीरथ में जा पावनता उर में भरते हैं।
पावनता जिस मन में आई तीरथ संग उसके हो लेता।
मन तीरथ के दर्शन करवा औरों को पावन कर देता।
ऐसे जन का ही इस जग में जीवन सदा सफल होता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।४।।
लाभ तभी तीरथ जाने का गर वहाँ जा निज द्वेष तजा है।
हृदय में बिठलाकर ईश्वर उसको ही बस रोज भजा है।
ईश्वर सबको अवसर देता अपने मन को पावन कर लो।
करके अपने मन को पावन स्वयं ईश को वश में कर लो।
जो नहीं लाभ उठाता अवसर, अंत समय वो ही रोता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।५।।
भाव अपावन पावन पल-पल पलते रहते मानव मन में।
भाव अपावन जो मन तजता वास ईश उस अंतर्मन में।
फिर तो सारे तीरथ आकर उस हृदय में संगम करते।
स्नेह भाव उस तीरथ मन में स्वयं सदा ही ईश्वर रखते।
तीरथ हो या वास ईश का पावन हृदय में होता है।
पावन भावों की गंगा में संत सदा खाता गोता है।।६।।

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