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महाभारत अंतस का.......

कुछ काम न हो तो सो जाना 

सबसे अच्छा उपाय होता है

कोशिश करती हूं स्वस्थ नींद ले लूं

दिमाग़ में जड़ता छाई हुई है

चूल्हा चौका दहक कर शांत पड़े हैं

साहित्य लाचार द्रौपदी बनी हुई है

और संस्कृति बाज़ार में नीलाम हो रही है

अपने पास बचा क्या ? 

हम ऐसे युद्धिष्ठिर हैं

जो बिना चौपड़ खेले ही दांव हार कर बैठे हैं

अपना बल-दल किसे दिखायें ...

ना मैदान है, ना अस्त्र-शस्त्र और ना अवसर

वास्तव में इन दिनों रचा जा रहा है

अतंस में एक अनोखा महाभारत

एक ऐसा महाभारत जिसमें सिर्फ 

एक ही व्यक्ति भूमिका निभा रहा है, 

अलग अलग पात्रों में

उगते सूरज को हाथ में उठाये रोज़ निकलता है

मगर किरणें कुंद सी चिपकी रहती उसी सूरज से

फैले तो उजाला हो, कोई झरोखा खुले

मार्गदर्शक नयन पथरीली पग में साथ चले

सुबह दोपहर में ढलती है समय के साथ

हाथ जलने लगते हैं आग का गोला उठाये

सूरज फिर से काला पड़ने लगता है

शाम सितारों के लिये मचल कर 

जब रात के पास भागती है न

तब यही छलिया सूरज 

मेरी हथेलियों से उछलकर

आकाश में चिपक जाता है चांद बनकर

तब तो बड़े मजे से चांदनी 

रात को रंगीन करती है

और मैं खाली हाथ लिये 

कभी उस चांद को और कभी 

अपने अंधेरे को देखती रह जाती हूं

मेरे भीतर का महाभारत 

युद्ध के ठहराव के साथ 

रुक जाता है फिर से सुबह के इन्तज़ार में......


आशा गुप्ता 'आशु'


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