सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

डंगवारा (परस्पर सहयोग)

साथियो! ग्रामीण अंचल में 'डंगवारा' एक बहुत ही सामान्य अंग है आचार व्यवहार का। उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' जी से जब इस पर लिखने का आग्रह किया गया तो प्रस्तुत कविता अस्तित्व में आई। आइए आनंद लेते हैं इस मौलिक कविता का।


भला किया जिसने भी उसका चढ़ जाता है यह डंगवारा। 

चैन  न  पाता  भला  मनुज है जब तक न डंगवारा तारा।


मानव जीवन पावन जीवन अंग सदा सहयोग समर्पण। 

संस्कार में भाव छुपा है मानव जग में सेवा अर्पण। 

सेवा व सहयोग सूत्र ही रूप सदा उपकारी होता। 

यह उपकारी कर्म मनुज का मनुज हेतु डंगवारी होता। 

कभी  चढ़ाना यह डंगवारा हर हृदय को लगता प्यारा। 

चैन न पाता भला मनुज है जब तक न डंगवारा तारा।।१।।


एक दूजे के बिना जगत में काम नहीं बिल्कुल भी चलता। 

जो  नहीं  माने सत्य तथ्य यह वो केवल अपने को छलता। 

अगर  काम   उपकारी   होगा  हर  कोई उसको मानेगा। 

 बस यह समझो डंगवारा ही चढ़ा हुआ खुद पर जानेगा। 

इन  डंगवारे  भावों  से  ही  घिरा  हुआ है यह जग सारा। 

चैन न पाता भला मनुज है जब तक न डंगवारा तारा।।२।।


डंगवारा  जो चढ़ा रहा है भाव यदि नहीं उसमें दंभी। 

बात न करता डंगवारे की नहीं हांकता लम्बी-लम्बी। 

तो डंगवारा चढ़ा है जिस पर वह न इसको कभी भूलता। 

डंगवारे  में   दबा-दबा ही वह इस जग में सदा घूमता। 

कभी-कभी तो नजरें तक भी मिला नहीं पाता बेचारा। 

चैन न पाता भला मनुज है जब तक न डंगवारा तारा।।३।।


जिसने  चढ़ा  दिया  डंगवारा  भूलो   उत्तम बात यही है।

लेकिन जिस पर चढ़ा हुआ है ना भूलो यह बात सही है।

आओ  मिलकर  डंगवारे  का मान करें और न बिसरावें।

एक  दूजे  पर  कर  डंगवारा भूल सदा को इसको जावें।

जीवन  भी  ईश्वर  डंगवारा  की  भक्ति  उसने  ही  तारा।

 चैन न पाता भला मनुज है जब तक न डंगवारा तारा।।४।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...