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'प्रणय-ज्योति' का लोकार्पण

    दिनांक 28-11-2023 को लोकप्रिय एवं यशस्वी कवि मनोज कुमार मनोज जी के पुण्य पिताश्री आचार्य एवं साहित्यकार धर्मपाल आर्य की प्रथम पुण्यतिथि पर डौरली गांव में कृति 'प्रणय-ज्योति'  का लोकार्पण किया गया।

   कार्यक्रम में डॉ हरिओम पंवार जी ने कहा कि रचनाओं को पुस्तक आकार देने से आर्य जी की स्मृति अक्षुण्ण बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि आर्य जी  को इससे बड़ी श्रद्धांजलि नहीं हो सकती कि उनके पुत्र मनोज कुमार मनोज द्वारा मृत्यु पश्चात उनकी कृति  'प्रणय -ज्योति'  को दुनिया के सामने लाना। उन्होने कहा कि एक पुत्र की योग्यता का आकलन इसी से होता है कि मृत्यु पश्चात कैसे कोई पुत्र अपने पिता के कार्यों को आगे बढाता है । 

     कार्यक्रम में डॉ हरिओम पंवार ने कवि सुमनेश सुमन को उनके पिता स्वर्गीय ताराचंद हारीत की स्मृति में उनकी अमूल्य अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए मंच से सर्वाधिक रुप से डांट फटकार लगाकर उन्हें अपने पिता स्वर्गीय ताराचंद हारीत की अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित कराने के प्रेरित किया । उन्होंने दोहराया कि अनेक बार वे सुमनेश सुमन जी से आग्रह कर चुके हैं लेकिन सुमनेश सुमन जी टाल मटोल करते रहे हैं। डॉ पंवार ने कहा कि आज खुले मंच पर यह बात कहने को वे मजबूर हुए हैं कि सुमनेश सुमन जी अपने पिताश्री ताराचंद हारीत जी की स्मृति में उनकी अमूल्य अप्रकाशित रचनाओं को संकलित कर शीघ्र प्रकाशित कराएं  ताकि हारीत जी की  स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखा जाए।

   डॉ हरिओम पंवार की डांट फटकार रंग लाने जा रही है। आज दिनांक 15-03-2024 को रास्ते में सुमनेश सुमन जी से सुभाष नगर में सड़क पर मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे सड़क पर देखा और आवाज लगाई। पूछने पर उन्होंने बताया कि कंप्यूटर पर अपने पिता स्वर्गीय ताराचंद हारीत की पुस्तक अप्रकाशित हारीत रघुवंश को कंप्यूटर पर टाइप करने देकर आया हूं।

मैंने मूल पांडुलिपि भी देखी,जो उनके साथ थी।जो 11-10-1943 को हारीत जी ने लिखी है,जो कलम दवात से लिखी हुई है और बही खाते रूप में हैं। सुमनेश जी ने बताया कि जब यह कृति लिखी गई थी तब पिताजी की आयु 23 वर्ष थी। उनके द्वारा पुस्तक को संपादित किया गया है और कुछ आवश्यक संशोधन और संवर्धन किया गया है। उन्होंने कहा कि आवश्यक मार्गदर्शन के लिए वे आज पंडित आशुतोष के पास जा रहें हैं।

     कवि सुमनेश सुमन जी को डॉ हरिओम पंवार की डांट चुभ गई और वे अपने पिता की अप्रकाशित रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित कराने को मजबूर हुए हैं। किसी बड़े बुजुर्ग की डांट फटकार से व्यक्ति सही रास्ते पर चलने लगें इसे हमारे ऋषि मुनियों ने साधू स्वभाव कहा है। जैसे विभीषण को रावण की लात चुभ गई और विभीषण सोने की लंका छोड़कर प्रभु राम की शरण में चले गए और बाद लंका के राजा बने आज सात चिरंजीवियों में विभीषण का नाम है।

       ऐसे ही कवि सुमनेश सुमन काव्य जगत की नई ऊंचाइयों को छूएंगे और अपने पिता जी का आशीर्वाद पाते रहेगें।  ऐसी हम सब सुमंगल कामनाएं करते है।

    जिस कार्यक्रम में डॉ. हरिओम पंवार ने डांट फटकार लगाई उसकी अध्यक्षता 92 वर्षीय प्रवासी साहित्यकार प्रो वेद प्रकाश वटुक ने  की थी । इस अवसर पर बंदा दिनेश कुमार शांडिल्य भी मौजूद था।इस अवसर पर पद्मश्री कंवल सिंह चौहान, डॉ चंद्रमणि ब्रह्मदत्त ,कौशल कुमार, योगेश समदर्शी ,डॉ राम गोपाल भारतीय, ब्रज राज किशोर राहगीर, ओंकार गुलशन,सत्य पाल सत्यम, मान सिंह चौहान, मेघराज चौहान, बलराम सिंह, सुमनेश सुमन, मंगल सिंह मंगल,राजीव कुमार, नवीन कुमार, पंकज योगी, सचेंद्र कुमार,कवयित्री सुषमा सवेरा, सरोज दूबे, रामकुमारी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन अर्जुन सिसौदिया ने किया था।

प्रस्तुति - दिनेश कुमार 'शांडिल्य' 

(एडवोकेट व अध्यक्ष, सहयोग सामाजिक संस्था, मेरठ)

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