विगत कई वर्षों से साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय वाग्देवी साहित्यिक संस्था ने अपना द्वितीय होली मिलन समारोह 'फाग बहार' NH- 58 सरधना रोड स्थित सूर्या पब्लिक स्कूल में आयोजित किया। इसमें शहर के ख्यातिनाम कवि सुमनेश सुमन, डॉ. ईश्वर चंद्र 'गंभीर', सुदेश 'दिव्य' सहित रामलखन पटेल, मंगल सिंह 'मंगल', धर्मपाल मित्र एवं व्यंग्यकार विनय नोक शामिल रहे। होली हास्य के रंग में रंगे सभी कवियों ने संदेशपरक कविताओं का पाठ किया, जिनकी बानगी यहां प्रस्तुत है।
सुदेश 'दिव्य' ने वाग्देवी वंदना पढ़ी-
"दिया है मैया ने ज्ञान इतना
हर एक प्रतिभा दिखा रहा है,
कोई सुरों को सजा रहा है
तो कोई पंचम में गा रहा है
पुराणों वेदों रामायणों में
हमारी वैदिक परंपरा है
धरा से लेकर गगन तक
विज्ञान पूरा भरा पड़ा है
सही समय पर निकलता सूरज
समय पर चंदा भी आ रहा है।
प्रख्यात कवि सुमनेश सुमन ने देशभक्तिपूर्ण कविता श्रोताओं के समक्ष रखी जिसे श्रोताओं द्वारा करतल ध्वनि से सराहा गया।
देशविरोधी षडयंत्रों के हम मंसूबों को तोड़ेंगे
देशद्रोह-आतंकवाद को कहीं न जिंदा छोड़ेंगे
नया खून है नई जवानी
तेवर वही पुराना है
बदली है दुनिया तो
भारत का भी नया तराना है आतंकियों से घबराकर
नहीं पीछे हटना जाना है
राष्ट्रधर्म के हित सीखा हंसते-हंसते जल जाना है।
सामाजिक विद्रूपताओं को सामने लाने वाले क्रांतिकारी कवि डॉ. ईश्वर चंद्र 'गंभीर' ने एक मुक्तक से अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता प्रकट की।
अन्याय के आगे सर झुकने नहीं दिया
जमीर को कभी बिकने नहीं दिया
आया ख्याल कई दफा चुटकुले लिखूं
इन बिगड़ी व्यवस्थाओं ने मगर लिखने नहीं दिया।
पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट है।
फल-फूल प्राणवायु दें इनको लगाइए
इनसे दवाई और घनी छांव पाइए
मरकर भी जलाते हैं ये चूल्हा गरीब का
पेड़ों सा मित्र दूसरा हो तो बताइए।
होली के रस से सराबोर श्रोताओं को उन्होंने निम्नलिखित पंक्तियों से होली के पवित्र त्यौहार की मर्यादा का भान कराया।
होली खेलो, जम के खेलो
मगर इतना ध्यान रहे
भैया भी नाराज ना हो
भाभी का सम्मान रहे।
होली के मस्त मौसम को चित्रित करती राम लखन पटेल की कुछ पंक्तियां देखिए-
बज उठीं मौसम में फिर से फागुनी शहनाइयां
प्राणों में संचार उल्लास का लिए होली आ गई
चांद के चेहरे पर फिर से खिल उठी हैं जवानियां
शीत कंपित गात पर फिर से ठिठोली आ गई।
कवि मंगल सिंह 'मंगल' ने होली पर कर्णप्रिय गीत का पाठ किया।
अलियों ने गुल के अधरों पर नाच-नाच कर घाव किए
फिर भी गुल ने तो अलियों को मन की दवा पिलाई है।
सतरंगी परिधान पहनकर रंग वासंती आई है
तभी धरा की हरी चुनरिया फूलों से सज पाई है।
काव्यपाठ के उपरांत संस्था के वरिष्ठ सदस्य श्री वीरेश कटारिया ने सभी आगंतुकों का आभार प्रकट किया और उपस्थित सभी भद्रजनों को जलपान के लिए आमंत्रित किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात कवि सुमनेश सुमन व संगीत शर्मा ने किया। उपस्थित गणमान्यों में राजेंद्र 'उमंग', रविंद्र भर्तृहरि, आलोक शर्मा, नरेंद्र दत्ताल, प्रवीण कुमार, महेंद्र रस्तोगी, चक्रधर प्रसाद मनोड़ी, अनिलकांत एवम् अजय मोहन शर्मा रहे। सामूहिक होली नृत्य, रंग-गुलाल के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
सूचना स्रोत एवं समाचार सृजक - श्री संगीत शर्मा जी




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