भूमिका
'गाँव अनूठा' रचना है उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण की। कवि ने अपने बाल्यकाल की अनुभूतियों का विवरण ग्राम प्रवास के दौरान का देने का प्रयास किया है और वो अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाने में सफल भी रहे हैं।
हर पल मेरा गाँव अनूठा बसा हुआ नयनों में पाया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।
बार-बार मन दौड़ लगाता बाबा के निर्मित डोले पर।
अटका मैं खुद को पाता हूँ मटरे और चने होले पर।
खेतों पर पीली सरसों की चादर अब भी महकाती है।
सैंद, फूट, कचरी व कुकड़ी मेरे मन को चहकाती है।
नयन बन्द कर जब भी बैठा खुद को गाँव बीच में पाया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।।१।।
कभी खेत पर बनी झोंपड़ी और टाँड भी दिखा खड़ा है।
दिखता करवा, घड़ा, पलैहैंडी, कुंडी और कढ़ाव बड़ा है।
बुनी मूंज-सन बानों की भी बसी हुई है मन में खटिया।
वहाँ ओक से प्यास बुझाती दिखी हाथ में मुझको लुटिया।
हाल चढ़ा पहिया गाड़ी का धीरे-धीरे चलता पाया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।।२।।
पड़ी पावड़ी, छाप, बिटौड़ा, बूँगा कहीं दुबारी दिखती।पीली मिट्टी और गोबर से लिपे चौक की खुश्बू मिलती।
राहे में उपलों से तपती मुझे दूध की हांडी दिखती।
ओटे वाली मुझे रसोई कभी-कभी सपने में मिलती।
याद आये बाबा की लाठी नीर नयन में भर-भर आया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।।३।।
लाल्ला तू कैसा है? मुझको लगते हैं ये आवाज लगाते।
आज गाँव में सुख-सुविधा है नहीं प्रेम की गंगा बहती।
छोड़ गाँव को शहरों में ही बसने की मन इच्छा रहती।
आज गाँव में फैल रही है शहरीपन की काली छाया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।।४।।
आज नगर के आकर्षण ने किया गाँव से खूब छलावा।
अब तो वहाँ भी पसर रहा है घर-घर में ही खूब दिखावा।
आधुनिकता ज्यों-ज्यों आती है संस्कार भी खो जाते हैं।
श्रद्धा, भक्ति और आदर के भाव सभी ही सो जाते हैं।
फिर भी मेरे मन से मेरा गाँव निकल न अब तक पाया।
मेरे सामने गली-मौहल्ला और वहाँ का रस्ता आया।।५।।


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