आज विश्व गौरैया दिवस पर गौरैया की ओर से मानव को पाती लिखने का प्रयास किया गया है। वर्तमान समय में गौरैया प्रजाति समाप्त होने के कगार पर है जी।
गौरैय्या
प्रिय मानव,
नमस्कार।
इस प्रकृति में असंख्य जीव-जंतु पशु-पक्षी सदियों से संग रहते आ रहे है। ईश्वर उन सबको कुछ - न - कुछ खाने और रहने को देता है। कहा भी गया है 'ईश्वर ने चोंच दी है तो चुग्गा भी देगा'। पर कुछ समय से,
हे मानव लगता है तुम्हारे मन में लालच, स्वार्थ की भावना घर कर गई है। तुमने अपने लोभ की खातिर जंगलों से पेड़ों को काटकर सड़कें, बड़े-बड़े फ्लैट्स बना दिए हैं। पर तुमने यह कभी नहीं सोचा कि ये पेड़ भी जीव-जंतुओं के आशियाने होते हैं। इन पेड़ों से ही उनको आहार भी मिलता है।
तुमने तो स्वयं के फायदे के अलावा और कुछ भी नहीं सोचा। मुझे वो दिन याद आते हैं, जब मैं गांव में पेड़ों पर बैठकर मीठी राग में बोलती थी। पेड़ों पर उछलकूद करती थी। घोंसला बनाती थी।
पर अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा। तुम्हारे स्वार्थ ने प्रकृति के पर्यावरण को असंतुलित कर दिया है। तुमने रात-दिन मशीनों से प्रकृति का अति दोहन, उत्खनन करके सारी प्राकृतिक व्यवस्था के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। जगह-जगह मोबाइल के टावर लगा दिए हैं। उनसे निकलने वाला रेडिएशन हमें श्वास तक नहीं लेने देता है।
हमारी जान की आफत बन गए हैं ये मोबाइल के टावर। दिनोंदिन हमारी संख्या घटती जा रही है। सरकार ने 2012 में हमें राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा तो दे दिया, पर हमारे संरक्षण के लिए कुछ भी नहीं किया। हे मानव! तुमने भी हमारे प्राणों की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया।
इन सबका परिणाम यह रहा कि आज हमारी संख्या पूरे देश में नगण्य हो गई है।
भारत देश को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। पर आज यहां असली गौरैया (चिड़िया) को भी जीने के लाले पड़ गए हैं। मानव अभी भी समय है संभल जाओ। मैं तुमसे हाथ जोड़कर विनती करती हूं। हमारे संरक्षण के लिए हर गांव के खेतों की मेड़ पर सघन वृक्षारोपण करके, हमारी बची हुई संतानों को बचा लो। आपके संरक्षण से ही हमारी वंश वृद्धि संभव हो पायेगी।
ताकि राष्ट्रीय पक्षी गौरैया पहले की तरह ही गांव-गांव में हर पेड़ पर अपने छोटे से मुंह से चीं चीं की मीठी आवाज करती सुनाई पड़ सके। सरकारी स्तर पर हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है पर जब तक जन समुदाय में गौरैया के संरक्षण के प्रति जागृति नहीं आएगी तब तक सरकारी स्तर पर भी कुछ नहीं किया जा सकता है।
"इस दिशा में टोंक जिले में टोडारायसिंह तहसील के साहित्य मंच 'टोडा' ने गौरैया बचाव हेतु राष्ट्रीय स्तर की पाती लेखन प्रतियोगिता व हस्ताक्षर अभियान चलाकर लोगों में जागरूकता के लिए बहुत अच्छा कार्य किया है।"
ऐसे ही पर्यावरण व पक्षी-प्रेमी पूर्व पार्षद कर्मवीर ढिल्लो ने करीब 5,000 घोंसले तैयार कर नि:शुल्क लोगों में अपने स्तर पर वितरित किए हैं। इसका उल्लेख यहां इसलिए किया जा रहा है क्योंकि गौरैया प्रजाति को बचाने के इस तरह के प्रयासों से ही लोगों में जागरूकता आती है।
इसी प्रकार अन्य विविध तरीकों से जब तक पूरा जनसमुदाय गौरैया संरक्षण के लिए आगे नहीं आएगा तब तक हमारी रक्षा नहीं हो पाएगी।
"मैं (गौरैया) आप सब इंसानों से यह विनती करती हूं कि आप जो भी नए-नए डिजाइन के भवन बना रहे हैं। उनमें भी हमारे लिए एक छोटी सी जगह ग्रीन कॉर्नर में मिट्टी व लकड़ी के घरोंदे बनाकर रखने की जगह भी जरूर बनाएं। हम कई तरह के कीड़े-मकोड़ों को खाकर, आपकी फसलों को भी सुरक्षा प्रदान करते है। आपके घर में मधुर आवाज से घर का वातावरण प्रातः काल से ही मधुरमय भी बनाते हैं।
इस प्रकार आप हमारी रक्षा करोगे तो आपको भी कई सारे फायदे होंगे।
बिगड़ते पर्यावरण की रक्षा भी हम करते हैं। आप अधिकांशतः पेड़ लगा हमारी व आपकी स्वयं की भी जीवन रक्षा कर सकोगे। पेड़ों से आपको तो ऑक्सीजन प्राप्त होगी, हमें भी रहने, खाने- पीने के लिए आहार मिलेगा।
इसी प्रार्थना और विनती के साथ मैं (गौरैया) यह पत्र आपको लिख रही हूं। मुझे पूरी आशा है आप हमारी प्रार्थना को जरूर सुनेंगे और हमारे बचाव के लिए प्रयास करना शुरू करेंगे।
आपकी प्यारी गौरैया
बुलबुल
(कल्पनाशीलता - हंसराज हंस, टोंक, राजस्थान)
Mob.9829434517
एक पत्र मानव के नाम
प्रिय मनु सन्दीप,
वंदन आपके चरणों में
ची-ची चू-चू ची-ची ,,,,इस आवाज को सुनकर शायद तुम मुझे पहचान गए होगे। हां, बिल्कुल, मैं तुम्हारे घर आंगन में रहने वाली एक नन्ही सी चिड़िया गौरैया ही हूँ।
मैं देख रही हूँ कि बड़ी प्रगति कर ली आप मानवों ने। बड़े बड़े घर,
भौतिकता से भरे पूरे साजो-सामान, शीशे के चमकदार खिड़की दरवाजे और भी न जाने क्या-क्या सुख-सुविधाएं। जरूरी भी है यह सब आप मनुष्यों के जीवन के लिए ।
शायद तुम्हे याद होगा जब आप छोटे थे घुटनो के बल चलते थे , तब मेरी परदादी गौरेया आपके घर आंगन में दरवाजे के ऊपर वाली ताक (मेडा ) में घोसला बनाकर रहती थी । दिनभर मेरी परदादी यहां वहां आंगन में इधर से उधर फुदकती रहती थी और आप उसे देख देखकर खुश होते हुए घुटनो के बल सरपट दौड़ते हुए उसे पकड़ लेने की कई-कई असफल कोशिशें करते रहते थे । यह खेल दिनभर में न जाने कितनी ही बार चलता रहता था । मगर मैं आज तुम्हें अपना दुख दर्द सुनाना चाहती हूं ।आपकी इस भौतिकता वादी दुनिया ने हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है ।आपने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े शीशे की खिड़कियों वाले घर बना लिए हैं जिससे अब हमारा उन घरों में आना-जाना दूभर हो गया है । आपके पूर्वज पहले कच्चे घरों में रहते थे , जिससे हमारी कई पीढ़ियां उन घरों में आसानी से आटी जाती रहती थीं और कहीं भी अपना घोंसला बना लिया करती थी ।
जिससे हमारा जीवन सर्दी, गर्मी, बरसात सभी तरह की मौसमी घटनाओं से सुरक्षित था । मगर अब जिन पेड़ों पर हम अपना घोंसला बनाती थी ना वह पेड़ रहे और ना आपके मकान में है हमें आने की स्वतंत्रता । क्योंकि आपलोगो को एक ही डर सताए रहता है कि तिनके-तिनके लाकर हम कहीं आपके घर को गंदा ना कर दे । हमारी विष्ठा(बीट) से आपके घर आंगन में लगे मार्बल, टाइल्स ,स्टोंस मेला-कुचिला ना हो जाए । इसी कारण चौतरफा शीशे के खिड़की दरवाजों से बंद आपके मकान , आपके घर में हमारा आना जाना बंद हो गया है । बाहर के पर्यावरण में हमारे रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा है । जिससे हमारा जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है और धीरे-धीरे हमारी संख्याएं भी कम होती जा रही है । मगर आप खुद अपने कृत्यों पर नजर डालें तो पाएंगे कि एक दिन में आप कितना कचरा इस धरती पर फैला देते हैं । उसका आप मनुष्य को कोई अफसोस नहीं है और हम अपना नीड बनाने के लिए जब एक तिनका भी आपके घर आंगन में गिरा देते हैं तो आप क्रोधाग्नि में जल उठते हैं और आपकी गृहिणीया झाड़ू लेकर हमें यहां वहां दौड़ती फिरती है और कभी आंख बचाकर अगर हम अपना घोसला बना भी लेती हैं तो यदा-कदा आप अपने मकानों की सफाई करके उस घोसले को बाहर सड़क पर फेंक देते हो । जरा सोचो कि उस वक्त हमारे दिल पर क्या बीतती होगी ।कितनी मेहनत से हम तीनका लाकर अपना घर बनाते हैं और आप उसे एक पल भर में कचरे के ढेर में फेंक देते हो । आप ही बताओ अब हम रहे तो कहां रहे । ना प्रकृति में हमारे लिए कोई स्थान बचा है और ना ही अब आप मनुषयो के घर में हमारे लिए कोई जगह बची है । कुछ मानवीयता बची है तो उन लोगों में जो अपने घरों में या आसपास हमारे रहने के लिए कृत्रिम चिड़िया घर बना करके दे रहे है । परिंडा अभियान चलाकर के हमारे लिए पेड़ों पर परिंडे बांधे जा रहे हैं । धन्य है कुछ ऐसे मानव भी जिन्हें हमारे लिए या हमारे जीवन की सुरक्षा के लिए इस तरह के अभियान चलाए हैं । आप भी उन्हीं इंसानियत का पालन करने वाली में से हो जिन्होंने हमारी संरक्षण के लिए अपने घर में हमें स्थान दिया है । मगर आपकी मनुष्य जाति के बहुत से इंसान ऐसे भी हैं जिन्हें हम फूटी आंख भी नहीं सुहाते और हमारे रहवासो को उजाड़ कर के रख देते हैं । इस धरती के समस्त प्राणी जगत में आप मनुष्य ही तो हमारे संरक्षक हैं ।हमारी रक्षा का उत्तरदायित्व आप पर ही निर्भर है । इसलिए मैं आप सभी से पुनः निवेदन करना चाहती हूं कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का अस्तित्व बचा रहे और हम भी चिरकाल तक इस धरती के अंग बने रहे , तो हमारे संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करते रहे । हमें अपने घर आंगन में रहने के लिए एक छोटा सा कोना जरूर दें । जिससे सर्दी, गर्मी ,बरसात के मौसम से सुरक्षित रह सके । अगर आप ऐसा करते हैं तो आप हमारे लिए भगवान के समान है । हम आपके लिए आप हमारे लिए यही तो जीवन का मूल मंत्र है । असहाय,कमजोर एवम अबोध प्राणियों की रक्षा करना यही तो मानव धर्म है । बस मैं इतना ही कहना चाहती हूं कि आप एक प्रण ले कि आपकी वजह से हमारा अस्तित्व खतरे में नही पड़े और यह शिक्षा आप अपनी सन्तति को भी देकर जाए । जिससे उन्हें भी अपने कर्तव्य बोध का भान रहे । बस मैं इतना ही कहना चाहती हूँ , अंत में ,मैं पुनः अपना गीत सुना कर पाती समाप्त करती हूँ
ची-ची ,चू-चू ,ची-ची-ची, चू-चू,ची-
ची । फुर्ररर,,फुर्ररर
आपके घर आंगन की एक नन्ही
गौरैया चिड़िया
लेखक : सन्दीप कुमार जैन
प्रबोधक L-1
राजकीय प्राथमिक विद्यालय ,सरदारपुरा ब्लॉक उनियारा जिला टोंक (राज )
बहुत बहुत आभार आदरणीय
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