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लिख दूं पाती यादों के गलियारे से

एक अनूठा उदाहरण है प्रस्तुत पुस्तक जिसमें बहुआयामी प्रतिभा श्री हंसराज हंस जी का पत्र प्रकाशित हुआ जिसको हम यथावत प्रकाशित कर रहे हैं। पुस्तक का आवरण निम्न है -


पत्र संख्या 88.


बनेठा 
04 फरवरी 2023

प्रिय मित्र,

भरत सिंह नमस्कार !

मित्र आज बैठे-बैठे मेरे मन में विचार आया कि आज से 3035 वर्ष पहले के मेरे गाँव बनेठा में एक राजा जी की कुई (बावड़ी) थी, जो उनकी कोठी में स्थित थी। शायद तुमको तो उसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। इसी सोच को लेकर मैंने आज यह पत्र तुमको लिखने की मन में ठानी है, क्योंकि इस कुई का इतिहास धीरे-धीरे समाप्त होने को है। आज वह कुई अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर है। नाममात्र कहने की कुई रह गई है। मैं जब भी उसको देखता हूँ तो मेरे सामने उसकी (कुई) पुरानी यादें दिलोदिमाग में भर आती हैं। क्या समय था वह भी? पूरे गाँव में एक ही तो थी मीठे पानी की कुई, जिसके पानी से चने की दाल तो ऐसी बनती थी कि, खाने वाले अपनी अँगुलियाँ ही चाटते रह जाते थे। पूरे गाँव की महिलाएँ पीने के लिए इसी कुई का मृदुल जल स्टील के चरों, मिट्टी के बरतनों, मटके, घड़े आदि में भरकर ले जाती थीं। अल सुबह से ही कुई के चारों ओर मेले जैसा माहौल हो जाता था। कुई की गहराई भी ज्यादा नहीं थी। कुई की गोल मुंडेर बहुत ही आकर्षक व सुंदर थी। राजाजी भी जब कभी यहाँ अपनी कोठी में आते तो झरोखे में से इस कुई को निहारते रहते थे। इस पनघट की कुई पर नवविवाहित स्त्रियाँ जब पानी भरने आती थीं तो अपने मन की बातें भी करती थी। गाँव के सभी बड़े-बूढ़े इस कुई के पानी के बारे में नव पुत्रवधू को पहले ही बता देते थे- बेटा पीने व खाना बनाने के लिए तो तुझे राजाजी की कुई का ही पानी लाना पड़ेगा। उस समय गाँव में मीठे पानी के लिए और भी कई कुएँ, बावड़ी थे पर इस कुई के पानी का स्वाद सबसे अलग ही था। वह दिन अब लद गये। जब मोहल्ले की सभी स्त्रियाँ पानी के खाली बर्तनों को बगल में व सिर पर रखकर, आपस में बातें करती हुई इस कुई पर पानी भरने जाती थीं। रास्ते में सुख-दुःख की बातें करने से उनका मन हल्का हो जाता था। इन बातों ही बातों में कई रिश्ते भी पक्के हो जाते थे। साथ ही पूरे गाँव के समाचार भी पनघट पर ही पता लग जाते थे।
मुझे तो मित्र उन दिनों के बारे में सोचकर ही बड़ा अच्छा लगता है। उस समय कोई झंझट नहीं था। बस अपना काम करो और मस्त रहो। आदमी स्वार्थी बिलकुल भी नहीं था। स्वार्थ की भावना से कोसों दूर था। आपस में सब एक-दूसरे से प्रेम करते थे। एक-दूसरे का आदर करते थे। मोहल्ले में कोई भी समस्या हो, चौपाल पर बैठकर ही उसका समाधान कर लेते थे।

मित्र, यह सब मैं तुमको इसलिए बता रहा हूँ कि पहले के आदमी के पास कुछ भी नहीं (सुख-सुविधा) था, पर फिर भी वह बहुत खुश था और आज आदमी के पास सब कुछ (सुख-सुविधा) है, पर फिर भी वह दुःखी है। मेरे को तो इसका मोटा कारण आत्मसंतोष का न होना लगता है। 
प्यारे मित्र, आज जब भी मैं राजा जी की कोठी में उस कुई को देखता हूँ, तो मन बड़ा दुःखी व खिन्न हो जाता है। एक समय था जब सब मांगलिक कार्यक्रमों में उस कुई का पूजन किया जाता था। चप्पल-जूते पहने उसमें से पानी नहीं खींचने दिया जाता था। अब ऐसा मान- सम्मान कुछ भी तो नहीं रहा। और हाँ अब तो राजा जी भी जिंदा नहीं रहे। उनके बेटे भी यदाकदा ही वहाँ आते हैं। अब तो वह कुई धीरे-धीरे खण्डहर में तब्दील होती जा रही है। मित्र एक दिन तो हद ही हो गई। मोहल्ले के कुछ नवयुवकों ने मिलकर उस कुई को मिट्टी से भरने की योजना बना ली थी। वह तो भला हो मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों का जिन्होंने उस कुई के मीठे पानी का इतिहास नवयुवकों को बताकर उसको मिट्टी से भरने से बचा लिया। साथ ही उन्होंने युवाओं को समझाया कि इसकी साफ-सफाई करके हम सब पुनः एक बार फिर मीठा पानी प्राप्त कर सकते हैं। देखो इस बात का युवाओं पर कितना असर होता है। यह तो भविष्य ही बतायेगा, पर अभी उसके इतिहास के बारे में तुमको बताकर मैंने अपने मन-मस्तिष्क के भार को उतार लिया है। अब मेरे मन को बहुत सुकून मिल रहा है। मित्र तुम्हारे गाँव में भी इस तरह की कोई ऐतिहासिक विरासत हो, या कोई पुरानी यादें तुम्हारे मन में हों तो उनका भी इतिहास आप मेरे को पत्र द्वारा जरूर से जरूर बताने की कृपा करना, क्योंकि ऐसा पुराना इतिहास जब तक हम एक-दूसरे को नहीं बतायेंगे तो यह हमेशा-हमेशा के लिए मिट जायेगा। 
मेरे प्यारे दोस्त, इसलिए हमें हमारी यादों के गलियारों को पत्रों के माध्यम से जीवित रखना है तो उनके बारे में एक-दूसरे को पत्र लिखना ही होगा। पत्रों में यह इतिहास जिंदा बना रहेगा।

आपका प्रिय मित्र 
हसंराज हंस (अध्यापक) 
तहसील- उनियारा, 
जिला-टोंक





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