सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बड़े भाई की बरसी पर छोटे भाई की तीये की बैठक - एक दु:खद समाचार

 पांच बार के युगल चैंपियन शटलर अशोक का निधन

समाचार जगत न्यूज

जयपुर, यह अजीब संयोग है कि अस्सी के दशक में अपने खेल से धूम मचाने वाले बैडमिंटन के राजस्थान के स्टेट चैंपियन दो भाई अब इस दुनिया में नहीं हैं और दुर्लभ संयोग यह है कि बड़े भाई कोच अनिल सिंह का निधन पूरे एक साल पहले गंभीर बीमारी के बाद हुआ था और छोटे भाई अशोक सिंह की तीये की बैठक के दिन (सोमवार को) उनकी बरसी है। ये दोनों चचेरे भाई थे।

बड़े भाई अनिल सिंह का निधन गत वर्ष तीन मार्च को हुआ था और छोटे भाई अशोक सिंह का भी लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ।

दोनों भाइयों की युगल जोडी ने स्टेट बैडमिंटन में अस्सी के दशक में धूम मचा दी थी। उस समय उनकी जोड़ी न केवल जयपुर बल्कि राजस्थान भर में सर्वश्रेष्ठ थी और लोग उनके खेल और स्टाइल के दीवाने थे। दोनों भाई पांच बार स्टेट चैंपियन रहे। उनके सामने कोई अन्य जोड़ी टिक ही नहीं पाती थी। डबल्स में उनका कोई सानी नहीं था।

अनिल सिंह ने दो बार भंवरलाल शर्मा के साथ भी डबल्स का खिताब जीता था। इसके अतिरिक्त अनिल सिंह अंतर्राष्ट्रीय अंपायर व रेफरी भी थे।

अशोक सिंह बांदीकुई के रहने वाले थे और आयकर विभाग में डिप्टी कमिश्नर थे। वे जूनियर राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियनशिप के सेमीफाइनल तक पहुंचे। ये कुल तीन भाई थे। इनके अलावा माधवेन्द्र सिंह और चन्द्रवीर सिंह इनके दो भाई और थे और दोनो राज्य स्तर के बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं। अशोक सिंह के दो लड़की व एक लड़का हैं। उनकी एक लड़की विदेश में है। उनके निधन पर राजस्थान बैडमिंटन संघ के सचिव के.के. शर्मा ने कहा कि उनके निधन से उनकी सरीखी डबल चैम्पियन जोड़ी आना मुश्किल है। उनके निधन से बैडमिंटन खेल में जो खालीपन आएगा उसका भरा जाना बहुत मुश्किल होगा। जयपुर जिला बैडमिंटन संघ के सचिव मनोज दासोत और कोषाध्यक्ष व आरबीए के हैड कोच अतुल गुप्ता ने भी गहरा शोक व्यक्त किया। मनोज दासोत ने कहा कि अनिल सिंह के बाद अशोक का जाना बैडमिंटन के लिए एक बड़ा आघात है। 

प्रस्तुति



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...