आज यश भाटी, जो 'अल्हड़' प्रकृति के हैं। उन्होंने आज प्रातः 15 मार्च 2024 को काव्य रचना जीवन में वजहों और बेवजह को ध्यान में रख की। साथ ही उन्होंने इस सृजन इस स्वरचित रचना को अपने प्रिय मित्रों के मध्य साझा किया।
गुल से उसकी मर्जी तो पूछो, चमन ने बहुत सफर किया है।
सजर से पूछो कब से खड़ा है, हमारी थकान मिटाने पर अड़ा है।।
हवा बहने की प्रतीक्षा में है, सहलाने की जिद पर अड़ी है।
माँ-माटी-ममता का आलम, हमारे सपनों के साथ खड़ी हैं।।
जाति वि जाति सूरज की किरणें, कब कहाँ हमसे पता पूछती हैं।
अविरल बहती नदियाँ हम ही से, बहने तक की वजह पूछती हैं।।
'अल्हड़' जज्बात समंदर में डूबे, दुनिया की बातें क्यूँ अटपटी हैं।
मालिक मेरे अब तुम ही बताओ, बे मतलब बातें क्यूँ कर खड़ी हैं।।

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