शंका ऐसा विष होता है सुख हर लेता जो जीवन का।
शंका ने जब मानव घेरा चैन गया खो उसके मन का।।
शंका से विश्वास स्वयं को सदा मानता ठगा-ठगा है।
पता नहीं लगता शंका से कौन पराया कौन सगा है।
शंका मुख से नहीं बोलती वह तो रहती सदा मौन है।
शंका स्वयं प्रश्न बन जाती प्रश्न करे हल कहो कौन है?
कभी-कभी तो जीवन भर ही भय रहता इस काले फन का।
शंका ने जब मानव घेरा चैन गया खो उसके मन का।।१।।
शक की दृष्टि के ही संग में जब कोई मानव चलता है।
चलते-फिरते हर कोई पर फिर वो निज दृष्टि रखता है।
उसको ऐसा लगता जैसे उसको सब जन घूर रहे हैं।
अपनों से अपने ही उसको जीवन में कर दूर रहे हैं।
उसको लगता दहका-दहका रोम-रोम ही अपने तन का।
शंका ने जब मानव घेरा चैन गया खो उसके मन का।।२।।
भला अगर कोई मानव है उसको सभी भले ही लगते।
कपटी को कपटी ढांचे में दूजे सदा ढले ही लगते।
कभी दिखी ये शंका बैरन जुल्म बड़े ही ढा जाती है।
बिन मतलब के चुप-चुप आकर बातें बहुत बढ़ा जाती है।
शंका को बनते देखा है कारण जीवन और मरण का।
शंका ने जब मानव घेरा चैन गया खो उसके मन का।।३।।
धोबी को शंका ने ही तो सीता को वनवास दिलाया।
स्वयं राम ने शंका आगे विवश बड़ा अपने को पाया।
शंका जब निर्मूल हुई तो मानव स्वयं सदा पछताया।
सदा सुखी वह ही जिस पर रंग न शंका का चढ़ पाया।
शंका करती पाई जग में कर्म स्वयं के ही दुश्मन का।
शंका ने जब मानव घेरा चैन गया खो उसके मन का।।४।।
प्रस्तुति

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