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उज्ज्वल या कलुषित

सदा विचारों का रहता है मानव मन में आना-जाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।


मानव मन चंचल होता है सदा विचारों के संग चलता। 

विचार उसे जो भा जाता है उसको लेकर खूब मचलता। 

पर विचार जो मन में आया महा विकारी भी हो सकता। 

लेकिन उज्ज्वल भाव मात्र ही सभी विकारों को धो सकता। 

ज्ञान ध्यान की उज्ज्वलता में कलुषिता का नहीं ठिकाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।।१।।


रजो-तमो औ सतो गुणों का वास सदा मानव में होता। 

जिस विचार की प्रचुरता हो उसमें ही मन खाता गोता। 

मानव मन की इच्छा शक्ति काम बड़ा आती जीवन में। 

उज्ज्वल मात्र विचारों को ही शक्ति ले जाती है मन में। 

विचार, सदा उज्ज्वल अरु कलुषित बुनते रहते ताना-बाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।।२।।


कभी-कभी भोला मानव भी इन्ही विचारों में फंस जाता। 

अनजाने में कर्म वो कलुषित अपने जीवन में कर जाता। 

उज्ज्वल-कलुषित भावों में घिर जब मानव धीरज धरता है। 

तब वो केवल उज्ज्वल का ही चयन सदा दिखता करता है। 

फिर तो केवल उज्ज्वलता का जीवन में गाता है गाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।।३।।


संस्कार मानव को जग में केवल सच्ची राह दिखाते।

उज्ज्वल मात्र विचारों की ही जीवन भर ही चाह जगाते। 

कलुषित भाव विचारों से ही मानव राह पतन पर जाता। 

कभी-कभी तो जीवन भर ही कलुषित मन डूबा रह जाता। 

मात्र विचारी उज्ज्वलता से संभव है जीवन सुख पाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।।४।।


मात्र विचारों से होता है सदा नियंत्रित मानव जीवन।

इन्हीं विचारों की शक्ति से पावन हो जाता मानव मन। 

हर विचार आये का मन में अपना ही आकार भार है। 

रखता वो स्वरूप वर्ण गुण प्रसारित करता व्यवहार है। 

रूप कोई भी धारण करके मन को आता इसे रिझाना।

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना ॥५।।


रंग विचार भी अलग-अलग है आध्यात्मिक रंग निराला। 

विचार क्रोध या द्वेषयुक्त है इसका वर्ण मिलेगा काला।

विचार और वाणी का रिश्ता सदा-सदा ही होता गहरा।

विचार स्वयं ही वाणी द्वारा अधरों पर पाता है ठहरा। 

प्राणवान तेजस्वी इसको गतिशील मटमैला जाना। 

है विचार उज्ज्वल या कलुषित ज्ञानवान ने ही पहचाना।।६।।

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