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संदेशों को समझना जरूरी

सृष्टि व जीवन में आचार व्यवहार की दृष्टि से कुछ-कुछ समझना बेहद दिलचस्प है तो जरूरी भी है। मसलन यदि किसी ने एक संदेश के माध्यम के कुछ कहा तो मैंने वास्तविकता को समझने का अवसर पाया और जाना कि 


प्रकृति ने हमको जो मौलिक तरीके से दिया था उसके कृत्रिम विकल्प ढूंढने के प्रयास में आज हम लगभग खाली हाथ हैं, तो संदेशों के माध्यम से हम जो बिना सोचे-समझे साझा करते जा रहे हैं वह कितना खोखला और थोथा है, जानिए। संदेश कुछ इस प्रकार था, जिसको विस्तारपूर्वक समझने की जरूरत है।

"कुछ चीजें समीप जाने पर बगैर मांगे मिल जाती है (हैं), जैसे - 

जल के पास शीतलता 

जल से शीतलता अनुभूत करने का मौलिक स्रोत

नि:संदेह, लेकिन यदि बंगलुरु (जहां पर अपुष्ट सूचनाओं के अनुसार जलाभाव के कारण पेड़ पौधों को जलापूर्ति तक प्रतिबंधित कर दी गई है।) की तरह जल का ही अभाव हो तो यह शीतलता नैसर्गिक रूप से महसूस कर पाना संभव नहीं।

वृक्ष के पास छांव 


वृक्ष की छांव का सदुपयोग
वास्तविकता

नि:संदेह, लेकिन यदि वृक्ष हों ही ना, जैसी आज दशा है 

वृक्षरहित हाईवे जहां छांव की कल्पना भी नहीं की जा सकती

और प्रामाणिक तथ्य होने के बाद भी वृक्षों का कटान दुर्दांत तरीके से जारी है और वृक्षों के रोपण की स्थिति से सब अवगत हैं।

अग्नि के पास गर्माहट

ऊष्मा का प्राकृतिक स्रोत ही गर्माहट दे सकने में सक्षम है

वास्तविकता

अग्नि के प्राकृतिक स्रोतों के होते ऐसा संभव था। आज अप्राकृतिक



इन स्रोतों से प्राकृतिक स्रोतों के समकक्ष गर्माहट की संभावना कम

स्रोत ही बहुतायत से उपलब्ध हैं। अतः गर्माहट जैसी प्राकृतिक अनुभूति कर इन स्रोतों से कर पाना लगभग असम्भव है।

पुष्प के पास कोमलता


पानी की बेंगलुरु जैसी न्यूनता से पुष्पों की संख्या में कमी ही नहीं हो गई है बल्कि उनका प्राकृतिक विकास भी संभव नहीं है।), 

चंदन के पास सुगंध (चंदन के वृक्ष ही कितने से हैं)..

भगवान् या गुरु से मांगने की बजाय आप निकटता बनायेंगे तो सब कुछ अपने आप मिलना शुरू हो जायेगा..(वर्तमान में  लगता तो नहीं)!"

आज की तारीख में सर्वाधिक सोचने की जरूरत है।


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