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हवा

हवा लगने को बहुत ही व्यापक रूप में लिया जाता है मसलन एक मुहावरे

'इसको तो हवा लग गई' 

का अर्थ है कि कोई व्यक्ति बुरी संगत में पड़ गया है। अतः कोई व्यक्ति जब कुसंगत में पड़ जाता है, तो उस स्थिति को दर्शाने के लिए इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार हवा को लेकर  कुछ अन्य मुहावरे और किवदंतियां समाज में प्रचलन में हैं तो उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने हवा पर ही एक रचना गढ़ दी। आइए उसका आनंद लीजिए -


हवा महा अनमोली जग में हवा बिना सूना जीवन। 

जीव और निर्जीव सभी को देती मात्र हवा जीवन।।


ये प्रकृति उपहार जगत को चलता इससे जनजीवन।

बिना हवा के शव बन जाता जग में हर मानव का तन।

श्वास स्वयं ही रूप हवा का बिना चले मचता क्रन्दन। 

हवा मनुष्य में जब तक रहती तब तक जीवन वृन्दावन। 

बिना हवा के मानव का तन केवल है धरती का कण। 

जीव और निर्जीव सभी को देती मात्र हवा जीवन।।१।।


खिला हुआ सुमनों का कानन हर पल दिखता मुस्काता।

लेकिन उनकी महक हवा का झोंका ही तो फैलाता। 

मानव मनवा मन्द-मन्द पुरवाई में झूमा पाता। 

लेकिन कभी हवा का झोंका दिखता मन को तरसाता। 

बिना हवा के उग न पावे धरती पर एक दाना अन्न। 

जीव और निर्जीव सभी को देती मात्र हवा जीवन।।२।।


रूप हवा जब बिगड़ा पाता हवा बवण्डर बन जाती। 

कभी संभलती नहीं दीखती जब भी इसको ठन जाती। 

गुण-अवगुण की खान हवा है मानव को यह मदमाती। 

भूत उतर जाता जब इसका हंसता मानव रुलवाती। 

हवा देख जो रंग बदलता सुखी वही पाया है जन। 

जीव और निर्जीव सभी को देती मात्र हवा जीवन।।३।।


कभी हवा शीतल चलती है कभी गर्म लू बरसाती। 

नयन हवा ही नीचा करती कभी यह तनकर चलवाती।

हवा स्वयं के रुख को देखा मानव को नित समझाती।

हवा कभी निष्ठुर बन जाती कभी यह पलकें बिछ्वाती। 

जो न कभी हवा से उलझे सहायक उसके हैं भगवन।

जीव और निर्जीव सभी को देती मात्र हवा जीवन।।४।।



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