सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ऑल इन वन कविता (कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण)

भूमिका

जीवन में विद्यादायिनी सरस्वती के आशीष यदि हों, तो कई बार अनियमित तरीके से तैयार रचनाएं भी विलक्षण हो जाती हैं और उनको क्रमबद्ध करके भी उनका अध्ययन कर सकते हैं। रचनाकार समेत आपको भी असीम आनंद की अनुभूति होगी। ऐसा टीम अंतर्संबंध का विश्वास है।

'सपन'

कौन जाने कब बिखर जाये सपन। 

     साथ मानव के सदा चलता कफन।।

यह मनुज जीवन सदा ही चीखता। 

     जिन्दगी में चैन नहीं है दीखता। 

जो है नश्वर मनुज उस पर रीझता। 

     नष्ट होते जग से कुछ न सीखता। 

कर रहा मानव ही मानव का दमन । 

     साथ मानव के सदा चलता कफन॥


एक दूजे को सदा हम नोचते। 

     मात्र हम ही ठीक केवल सोचते। 

खोल खुद के नयन सुख को खोजते। 

     नित नवल सपनों को मन में रोपते। 

हम सदा सपनों में करते हैं रमण। 

     साथ मानव के सदा चलता कफन।।


बढ़ती मन में नित नवेली लालसा। 

     बुन लिया चहुँ ओर हमने जाल-सा। 

ढूंढते मिल जाय कोई ढाल-सा। 

     वक्त लगता लख विफलता काल-सा। 

खोज न पाते हैं जीवन का चमन। 

     साथ मानव के सदा चलता कफन॥ 


हो गये हम आज खुद से दूर हैं। 

     कौन जाने किस नशे में चूर हैं। 

आज खो बैठे हम अपना नूर हैं। 

     देखते हम किस तरह मजबूर हैं। 

दूर दुविधा हो करो ईश्वर नमन। 

     साथ मानव के सदा चलता कफन॥

'जीवन एक सराय'

है सराय जिसको ये मानव 

     अपना सुन्दर महल समझता। 

उस सराय का किंतु जग में 

     स्वामी देखा नित बदलता।


आज जिसे हम अपना कहते 

     कल देखा कोई और बसा था। 

सदा रहेगा जैसे इसमें 

     बड़े जोर से इसे कसा था। 

पता नहीं था इस पर कोई 

     अपनी नज़र गड़ाये बैठा। 

भले गयी हो काया जर जर 

     फिर भी दीख रहा था ऐंठा। 

जब स्वामी कोई आये दूसरा 

     पता नहीं बिल्कुल भी चलता। 

उस सराय का किंतु जग में 

     स्वामी देखा रोज बदलता।।१।।


जन्म हुआ तो ईश्वर ने ही 

     हमें दिया था एक ठिकाना। 

लेकिन हमने सदा-सदा को 

     दिया ठिकाना अपना माना। 

हम केवल रक्षक हैं इसके 

     स्वामी कभी नहीं बन सकते। 

आये हैं हम कुछ ही दिनों को 

     नहीं अमर होकर बस सकते। 

यह जीवन दिनकर-सा जैसा 

     उगता, चढ़ता पाया ढलता। 

उस सराय का किंतु जग में 

     स्वामी देखा रोज बदलता।।२।।


नहीं बात यह मात्र महल की 

     तन तक भी है ईश धरोहर। 

स्वयं आत्मा अंश ईश की 

     जिसको दिया ईश ने तन घर। 

कुछ दिन रहकर यही आत्मा 

     तन को छोड़ चली जाती है। 

तन की बड़ी विवशता जग में 

     शमशानों में दिख पाती है। 

छीन कफन तक भी ले जाते 

     दिखता है केवल तन जलता। 

उस सराय का किंतु जग में 

     स्वामी देखा रोज बदलता।।३।।


सराय मनुज निर्मित करता है 

     पाप पुण्य को जोड़-जोड़कर। 

सदा रहेगा जैसे इसमें 

     कोशिश करता जोड़-तोड़कर। 

मानव छोड़ सराय जाता 

     तन भी यहीं पड़ा रहता है। 

फिर भी देखा दुष्कर्मों पर 

     मानव सदा अड़ा रहता है। 

उस सराय का किंतु जग में 

     स्वामी देखा रोज बदलता।।

'सफल जीवन'

कर्तव्यनिष्ठ, निष्ठा ईश्वर, 

     जब होता निर्मल अंतर्मन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।


जब पर सेवा का भाव जगे 

     हर राग द्वेष से दूरी हो। 

सद्‌भाव सदा हृदय में हो 

     यह कोई नहीं मजबूरी हो। 

है दोष ईर्ष्या का ऐसा 

     पावन मन में बनता बाधक। 

समभाव बिना कोई मानव 

     बन पाया नहीं सच्चा साधक। 

छल, दम्भ, द्वेष, पाखंडों बिन 

     जो जीवन वही सफल जीवन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।१।।


जब मिलता मानव जीवन है 

     हम बनते पहले बालक हैं। 

इस जग में मात पिता ही 

     तो केवल बालक से पालक हैं। 

है मात पिता का महा कर्म 

     उस बालक को संस्कार मिलें। 

गुण उसमें ऐसे उपजायें 

     जो पूर्ण जगत का प्यार मिले। 

जिसके बालक हैं संस्कारी 

     उसका ही हुआ सफल जीवन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।२।।


मानव में धर्म कर्म सारे 

     बस संस्कार से आते हैं। 

धर्म कर्म करके ही तो 

     मानव ईश्वर को पाते हैं। 

मन में कोमलता चलती है 

     पर पीर सदा मन मथती है। 

पर पीर भगाने की युक्ति 

     कहलाती ईश्वर भक्ति है। 

जिस मन में भक्ति आन बसी है 

     सफल वही जीवन में जन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।३।।


बिन किये कर्म कोई जग में 

     पल भर को भी नहीं रह सकता। 

दुष्कर्म मगर साधु हृदय 

     ना कर सकता ना सह सकता। 

यह कर्म क्षेत्र है जग सारा 

     हर कर्ता को चुनना पड़ता। 

गर कर्म अकर्मी चुन डाले 

     जीवन भर सिर धुनना पड़ता। 

जिसको कर्मों पर विजय मिली 

     उसका ही सफल हुआ जीवन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।४।।


धन दौलत मात्र कमाने से 

     यह सफल नहीं होता जीवन। 

सद्चरित्र नहीं जो जीवन है 

     वो निष्फल ही होता जीवन। 

तुम प्रेम करो जग से कितना 

     पर राष्ट्र प्रेम की बात अलग। 

है राष्ट्र प्रेम जीवन का अंग 

     हो नहीं सकता कभी विलग। 

वो भी जीवन है सफल सदा 

     जिसमें बसता है जन-गण-मन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।५।।


हो कर्म कोई भी जीवन का 

     वो कर्म न होवे दुखदाई। 

उपकार भाव हो मानव का 

     अन्तस को होता सुखदाई। 

यदि किये कर्म से दुनिया में 

     दूजे ने कोई दु:ख पाया। 

फिर तो उसने इस जीवन में 

     केवल खोया कुछ‌ नहीं पाया। 

है दया भरी जिस जीवन में 

     खुश रहते हैं उससे भगवन। 

जब पूजा जैसा कर्म धर्म 

     है सफल तभी मानव जीवन।।६।।

'दोष किसका'

संकट आने पर ही मानव दोष दूसरों को देता। 

क्या दुष्कर्म किये हैं उसने ध्यान नहीं उन पर देता।।


पितृ, वास्तु, शनि दोष सब उसको मात्र नजर आते। 

सदा निवारण इनका करते मानव जग में दिख जाते। 

जगह-जगह पंडित औ मुल्ला इन्तजार करते मिलते। 

इन दोषों से दिलवाने मुक्ति युक्ति बतलाते दिखते। 

मानो मुल्ला पंडित सारे दोषों को ही हर लेता। 

क्या दुष्कर्म किये हैं उसने ध्यान नहीं उन पर देता।।


विधना का एक नियम बना है जो बोओगे काटोगे। 

सुख दुख को खुद ही ढोना है नहीं किसी से बाँटोगे। 

'जैसी करनी वैसी भरनी' चूक नहीं इसमें होती। 

याद नहीं करती रहती है इसीलिये दुनिया रोती। 

कर्म भोगना निश्चित पड़‌ता छूट नहीं ईश्वर देता। 

क्या दुष्कर्म किये हैं उसने ध्यान नहीं उन पर देता।।


फिर भी हम मानव धरती के देव नहीं हैं बन पाते। 

सद्पथ जो जीवन का होता कहाँ कभी हम चल पाते।

अनजाने में दुष्कर्मों को कभी-कभी कर पछताते। 

इसीलिये कंटक धरती के जब चुभते तो खाल जाते। 

हरि इच्छा जिसने ये समझा कष्ट उसे पल कम देता। 

क्या दुष्कर्म किये हैं उसने ध्यान नहीं उन पर देता।।


दोषों से मुक्ति पाने को ईश सदा भजना होगा। 

गर विकार मन में पनपा है उसको तो तजना होगा। 

कर्म भोगों की भूमि है जग बड़ा झमेला कर्मों का। 

पूर्व जन्म या कर्म आज के ये सब रेला धर्मों का। 

कभी कष्ट नहीं उसको होता जो हरि भज नैया खेता।

क्या दुष्कर्म किये हैं उसने ध्यान नहीं उन पर देता।।

'आत्मबोध'

अपने को जाने बिन कैसे दुनिया को हम पहचानेंगे? 

आत्म निरीक्षण बहुत जरूरी तब ही तो खुद को जानेंगे।।


जीवन का क्या लक्ष्य हमारा पता नहीं खुद को भी चलता। 

मानव लक्ष्य साध न पाता जीवन भर खुद को ही छलता। 

जान सको तुम पूरे जग को मगर जानना खुद को दुष्कर। 

तुमसे ज्यादा तुमको जग में सदा जानता है परमेश्वर।

मात्र बात अपनी ही मानें कहाँ दूसरे की मानेंगे। 

आत्म निरीक्षण बहुत जरूरी तब ही तो खुद को जानेंगे।।


'क्या करते', 'कैसे करते' हम इसे जानना बहुत जरूरी। 

कौन कर्म ऐसा है जिससे अच्छा होता रखना दूरी। 

कोई कर्म ऐसे हो जाते अर्थ नहीं जिनका जीवन में। 

कांटे से चुभते रहते हैं पड़े हुए भोले से मन में। 

इनसे मुक्ति तभी मिलेगी जब अपने मन में ठानेंगे।

आत्म निरीक्षण बहुत जरूरी तब ही तो खुद को जानेंगे।।


पाप कर्म से करी कमाई और उसी से दान दिया कर। 

क्या इस पुण्य कर्म को बोलो पुण्य कर्म मानेंगे ईश्वर?

भाव सदा उद्वेलित होंगे ऐसे पुण्य कर्म से जग में। 

छुप छुप अश्रु भी पाओगे बहते अपने दोनों दृग में। 

जब भी मनन करेंगे इस पर बात पुण्य की नहीं मानेंगे। 

आत्म निरीक्षण बहुत जरूरी तब ही तो खुद को जानेंगे।।


दौड़ लगा लो कितनी जग में आना तो खुद पर पड़ता है। 

समझ नहीं पाया जो खुद को ये केवल उसकी जड़ता है। 

मन सबका चंचल होता है अनुशासित इसको करना है। 

जिसे आत्मा सदा कचोटे कभी कर्म नहीं वो करना है। 

नहीं आत्मा झूठ बोलती सुखी रहेंगे जो मानेंगे। 

आत्म निरीक्षण बहुत जरूरी तब ही तो खुद को जानेंगे।।

रचनाकार 

कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...