मानव जीवन अद्भुत है। इसको लेकर जीवन की विविध गतिविधियों में जो मतिभ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है वह हमको बहुत कुछ समझाने में सहायक होती है।
प्रस्तुत पंक्तियों में उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' ने नश्वर जीवन के संदर्भ में अपना मत व्यक्त किया है।
सभी जानते जाना जग से फिर भी मन भय खाता है।
सम्मुख लखकर मौत मनुज का ज्ञान धरा रह जाता है।।
इस जग में हर वस्तु नश्वर अमर मात्र ईश्वर होता।
नश्वरता के मोह कूप में मानव नित खाता गोता।
नश्वर वस्तु का भी सृजन करता वो ही है भगवा।
नश्वर से कर प्रेम जगत में मानव काट रहा जीवन।
नश्वरता को नश्वर मानव महा कष्ट सह जाता है।
सम्मुख लखकर मौत मनुज का ज्ञान धरा रह जाता है।।१।।
नश्वर सृष्टि रची ईश ने उसका खेल निराला है।
माया, ममता, मोह, मनुज में उसने ही तो पाला है।
उसे पता है बिन मोह ममता सृष्टि नहीं चलने वाली।
इसके बिन नश्वर मानव की दाल नहीं गलने वाली।
मोह ममत्व के संग ही जग में सृजन होता पाता है।
सम्मुख लखकर मौत मनुज का ज्ञान घरा रह जाता है।।२।।
नश्वर का भी जीना मरना ईश्वर स्वयं संभाले है।
पर मानव न जाने कितने सपने मन में पाले है।
मोह ममता ली जीत है जिसने भय न उसे सताता है।
सबसे करता प्रेम सभी को अपना सदा बताता है।
ऐसे मानव से ईश्वर भी दिखा सदा हर्षाता है।
सम्मुख लखकर मौत मनुज का ज्ञान घरा रह जाता है।।३।।
नश्वर मानव को ईश्वर ने ही धर्म कर्म बतलाये हैं।
पाप पुण्य का भेद साथ दे उसने ही समझाये हैं।
जीवन भर मानव को जग में धर्म कर्म पर चलना है।
जैसा कर्म करेगा मानव वैसा ही फल भरना है।
धर्म मार्ग पर जो चलता वो जीवन सफल बनाता है।
सम्मुख लखकर मौत मनुज का ज्ञान धरा रह जाता है॥४।।
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