(हिंदू धर्म में, किसी की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को अन्त्येष्टि कहा जाता है। अन्त्येष्टि के लिए कांधी देने के दौरान की बहुत ही मार्मिक अवस्था का उल्लेख कवि कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' ने प्रस्तुत पंक्तियों में किया है।)
अन्त समय मानव दूजों के कन्धों पर चढ़ कर जाता।
यह उपकारी भार सदा वह हृदय पर रखकर जाता।
उसकी सदा आत्मा उसको करती रहती है विचलित।
कैसे भार उतारूंगा यह सोच-सोच रहता चिन्तित।
मन में यही भाव उठते हैं गर थोड़ा जीवन मिलता।
करके यह उपकार किसी का, खुद मेरा अंतस खिलता।
जाते-जाते मानव मन में भाव यही लेकर जाता।
यह उपकारी भार सदा वह हृदय पर रखकर जाता।।१।।
जीवन रहते मानव जग में सदा मस्त बनकर रहता।
कल क्या होगा नहीं सोचता वर्तमान में ही बहता।
जब सजती डोली मानव की लोग पराए भी आते।
देकर उस डोली को कन्धा उधार स्वयं ही दे जाते।
यह उधार सब पर चढ़ता है फौरन नहीं उतर पाता।
यह उपकारी भार सदा वह हृदय पर रखकर जाता।।२।।
ज्ञानीजन कहते हैं जब भी अन्तिम डोली जाती हो।
बहती अश्रुधार विरह की नहीं वहां रुक पाती हो।
तो उस डोली को निज कन्धा जीवन में निश्चित देना।
जो उधार तुम पर पड़ना है उससे कुछ मुक्ति लेना।
अन्त समय वह पछताता जिससे खो यह अवसर जाता।
यह उपकारी भार सदा वह हृदय पर रखकर जाता।।३।।
डोली पर लेटे मानव के साथ आत्मा चलती है।
नश्वर काया साथ जो चलते श्रद्धा सदा उमड़ती है।
इस डोली पर सबको चढ़ना बचा नहीं कोई जग में।
कन्धा अगर दिया न तुमने लाज स्वयं आती दृग में।
यही आत्मा भाव मनुज का द्रवित खुद को कर जाता।
यह उपकारी भार सदा वह हृदय पर रखकर जाता।।४।।

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