देश भर में विविध स्थानों पर कूड़े करकट के एकत्र कर दिए जाने से व्यथित उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण जी ने कूड़े करकट ही को एक विषय बनाकर कूड़ा करकट पर ही एक रचना सहज भाव से लिख दी। यह कविता निश्चित ही आपका मन हर लेगी।
कूड़ा करकट ढेर आजकल जगह जगह ही मिल जाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।
घर में रोज लगाकर झाड़ू कूड़े का हैं ढेर लगाते।
कूड़ा वाहन इसको आकर संग स्वयं के हैं ले जाते।
निस्तारण वो इस कूड़े का ढेर लगाकर ही करते हैं।
कुछ ऐसे निस्तारण कूड़ा नदियों में कर नहिं थकते हैं।
कूड़ा बहता इन नदियों में नयन खोलकर दिख पाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।१।।
घर में जमा न कूड़ा होवे, केवल इतना ध्यान हमें है।
कूड़ा करकट कभी न अच्छा इसका अच्छा ज्ञान हमें है।
जाना वहाँ चाहिए कूड़ा जहां पे इसका बना ठिकाना।
अपना नैतिक दायित्व बड़ा यह हमें चाहिए इसे निभाना।
कूड़ा जग का या मन का हो दु:ख देता जब टिक जाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।२।।
घर में जमा हुए कूड़े को, हम सब साफ रोज करते हैं।
पर मन में जो जमा है कूड़ा उसको साफ कहाँ करते हैं?
नित करके स्नान सदा हम अपना तन सुन्दर रखते हैं।
किन्तु नहीं नहलाते मन को मैल जमा उसमें रखते हैं।
दूजे का सब मैल दीखता अपना कभी न दिख पाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।३।।
दोष हमारी दृष्टि का है मैले भावों का यह रस्ता।
मैले भावों का यह रस्ता बन जाता है सबसे सस्ता।
कूड़े सम भावों को लेकर नित ही हम घर में आते हैं।
मन से उसको साफ न करके रोज जमा करते जाते हैं।
जीवन भर को मैला करकट अपने अन्दर टिक जाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।४।।
एक दृष्टि तन की होती है जिससे मैला मन में आता।
लेकिन मन की पावन दृष्टि जिससे बाहर चला वह जाता।
कूड़ा करकट कभी कोई भी नहीं समेटे घर में रखता।
फिर क्यूँ मानव पावन मन में कूड़ा मैंल समेटे रखता।
मन में निर्मल गंगा ऐसी जमा मैल भी बह जाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।५।।
मन, धरती का कूड़ा करकट केवल प्रदूषण फैलाता।
प्रदूषण हो भले कोई भी मानव श्वास नहीं ले पाता।
मन का या धरती प्रदूषण मानव ही निर्माता इसका।
पहले धरती पर दु:ख भोगे फिर ऊपर फल पाता इसका!
केवल पावनतम मन भू से मानव जग में सुख पाता है।
नगर, गाँव या पथ कोई हो सर्वत्र ही यह दिख जाता है।।६।।
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