पहचान स्वयं के अस्तित्व को गर इसको है निखारना।
खेतिहर को प्रत्येक पथरीले रस्ते से है पार पाना।
सीधे-सच्चे होकर भी हमको तो है मंजिल को पाना।
सीमित बुद्धि से ही सही पर कठिन डगर से है पार पाना।
भरोसा मन पर असीमित विजय हमारी निश्चित ही होगी।
आत्मविश्वास तो इतना है कि अब कोई अड़चन न होगी।
बुलन्द इरादों के बल पर नभ को भी है हमको चुकाना।
बोधगम्यता को बना सारथी जग में है आगे बढ़ दिखाना।
ध्येय है कृषक-सा कि कभी भी संकट से नहीं घबराना।
नव पीढ़ी को आदर्श बना अपना ही इतिहास पढ़ाना।
हर मन में आशा हो संचित नहीं निराशा आकर के घेरे।
हर स्वप्न हो साकार सभी का कभी न होवे तेरे-मेरे।
शब्दशिल्प
(संपादन- कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण')


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