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सक्षम-अक्षम

वर्तमान स्थितियों को देखते हुए आज अक्षम सक्षम में सहज भाव से भेद किया जाना असंभव-सा लगता है। उत्तराखंड के प्रख्यात कवि श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' ने इस संदर्भ में अपना दृष्टिकोण एक कविता 'सक्षम-अक्षम' के माध्यम से स्पष्ट किया है। आइए आनंद लीजिए उनकी इस नूतन कविता का

हर सक्षम के हृदय में अब नूतन भाव जगाना है।

हर अक्षम को सक्षम द्वारा सक्षम मनुज बनाना है।


जो भी सक्षम आज रहे दिख वो भी एक दिन थे अक्षम।

उनको भी तो सक्षम ने ही बना दिखाया था सक्षम।

किसी क्षेत्र का ज्ञानवान ही सक्षम जन कहलाता है।

अपनी ज्ञान गंग में ही वह जन-जन को नहलाता है। 

इस गंगा में अक्षम को भी अब डुबकी लगवाना है।

हर अक्षम को सक्षम द्वारा सक्षम मनुज बनाना है।।१।।

नील गगन में तारे कितने सभी रोशनी बरसाते।

कुछ दिखते हैं अधिक चमकते पर कुछ कम चमके पाते। 

लेकिन इन तारों से ज्यादा चन्दा अधिक चमकता है।

महा रोशनी में सक्षम वह लेकिन नहीं भटकता है। 

तारों जैसे अनगिन जन को चन्दा सा चमकाना है।

हर अक्षम को सक्षम द्वारा सक्षम मनुज बनाना है।।२।।

दान  सभी  अच्छे  होते  हैं  उत्तम दान   ज्ञान  होता। 

करता  है जो दान ज्ञान का उसका अधिक मान होता।

ज्ञान रूप इस सक्षमता का मोल तभी जब बाँटोगे।

अक्षमता के काले घन को सक्षमता से छांटोगे।

अक्षम मन से अक्षमता की मिल कर सोच भगाना है।

हर अक्षम को सक्षम द्वारा सक्षम मनुज बनाना है।।३।।

कर्मठता या साहस जग में सबमें अलग-अलग होता।

कम साहस वाला पाया है बैठ अकेले में रोता।

हीन भाव से ग्रसित होकर खुद को जान नहीं पाता।

वो भी सब कुछ कर सकता शक्ति पहचान नहीं पाता। 

अक्षम को उसकी शक्ति की सच्ची पहचान कराना है।

हर अक्षम को सक्षम द्वारा सक्षम मनुज बनाना है।।४।।


दिनांक 20.12.2024

टिप्पणियाँ

  1. बहुत दिनों बाद एक सुंदर कविता पढ़ने को मिली। रचनाकार का धन्यवाद।

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