साथियो! निरंकुश जीवन से कहीं अधिक सुखद अनुभूति देता है टोका टाकी वाला माहौल। यह माहौल किसी को भी ऐसा वातावरण सुलभ कराता है, जो अंकुश के साथ अनुशासन के दायरे में और सीमाओं में रहना सिखाता है। दिलचस्प यह है कि समाज के हर तबके और रिश्ते के अनुकूल अपनी 'मनेच्छा' को शब्दशिल्पी कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने अपनी कविता में पिरो दिया है। आइए आनंद लेते हैं इस शब्दशिल्पी की शिल्पकारी का।
मन करता है मुझको कोई इस जीवन में रोके टोके।
मैं बात करूं जिससे मन की कुछ हँसकर या फिर रो धो के।।
मन पंछी ऊँचा उड़कर भी अपना एक नीड़ चाहता है।
कोई करे नीड़ में प्रतीक्षा ये भाव हिय महकाता है।
यदि देर गयी हो आने में कोई पूछे 'अब तक कहाँ रहे'।
सब बतलाओ अपनी मुझको तुम जैसे भी हो जहाँ रहे।
वो भार बात का बांटो तुम जो जो भी लाये हो ढो के।
मैं बात करूं जिससे मन की कुछ हँसकर या फिर रो धो के।।
उसका नियन्त्रण जरूरी है जिसको तुम करते प्यार घना।
जो बोलेगा वो मानोगे तुम कर न सको एक बार मना।
है भाव नियन्त्रण अलग अलग सब में पर पावन भाव भरा।
कहीं मात-पिता की चिन्ता है कहीं बाल सुलभ सा चाव भरा।
अधिकारों से पूर्ण नियन्त्रण के रखती है पत्नी मौके।
मैं बात करूं जिससे मन की कुछ हंसकर या फिर रो धो कर।
जो रोका टोका नहीं गया वो दिखता सदा भटकता है।
वो बिना ताल लय स्वर के ही बस दिखता सदा मटकता है।
कोई राह पतन की मिल जाती बिन टोके सही समझता है।
जब कांटे मिलते राहों में उनमें ही सदा उलझता है।
यदि नहीं जगाने वाला है तो कभी नहीं थकता सो के।
मैं बात करूं जिससे मन की कुछ हंसकर या फिर रो धो के।
इस टोका टाकी से ही तो ये सदा संवरता है जीवन।
जब टोका टाकी हुई नहीं स्वच्छंद सदा रहता है मन।
ये बिना नियंत्रण वाले ही करते मिलते हैं अनाचार।
मानव बन जाता दानव है वो कर नहीं पाता सदाचार।
बस ऐसे ही जीवन जग को पल पल ही देते हैं धोखे।
मैं बात करूं जिससे मन की कुछ हंसकर या फिर रो धो के।।
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