सृष्टि में समस्त मानवों का अपना अपना और भिन्न नजरिया होता है जिसको ध्यान में रखकर वे अपने उद्देश्यों का निर्धारण करते हैं और उसी के माध्यम से अपने जीवन को दिशा देने का सतत प्रयास करते रहते हैं। मानव जीवन के उन्नयन की दिशा में उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से निरंतर लगे रहते हैं। यही कारण है कि कुछ स्थानीय लोग उनको 'कविताओं की मशीन' का विशेषण प्रदान करते हैं।
आइए, उनकी नवीनतम रचना का आनंद लीजिए (परिचय संतोष कुमार जी द्वारा संपादित) -
चुनाव का मौसम था,
एक नेता जी हांफते हुए आए।
मैं बोला, "बात क्या है? क्यों हो इतने घबराए।"
नेता जी ने थोड़ा धैर्य धरकर
एक दार्शनिक की भांति अपनी बात मुझे समझाई।
वो बोले, "जो बात तुम्हें बताने आया, उसको पूरी सुन लो मेरे भाई।
मेरे मन में जनता की सेवा का भाव पूरी तरह जाग गया है।
अथवा यह समझ लो, सेवा करने का रोग लग गया है।"
मैं बोला, "यह तो बड़ी अच्छी बात है
दुनिया में सेवा करने के अनेकों ढंग हैं।
सेवा कर्म में भी देखे हैं,
भरे हुए भिन्न-भिन्न रंग हैं।
जो कर्म सेवा कर्म कहलाते हैं,
उन्हें बतलाता हूँ।
'सेवा कैसे कर सकते हो?'
यह भी समझाता हूं।
किसी कमजोर को सहायता करके पुण्य कमा सकते हो।
किसी भूखे को खाना और प्यासे को पानी पिला सकते हो।
किसी गरीब की चिकित्सा अपनी ओर से करा सकते हो।
कोई चिकित्सालय, पुस्तकालय या निःशुल्क विद्यालय चला या चलवा सकते हो।
सेवा का एक आध्यात्मिक रूप भी है।
किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या
गिरिजाघर में वहाँ की आवश्यकतानुसार सेवा करके
मन की निकाल सकते हो।
यह भी कह सकते हो कि
अपनी सेवा का भूत उतार सकते हो।
वहाँ पर बर्तनों की सफाई,
जूतों की रखवाली, झाड़ू और पोंछा लगाई।
फर्श की धुलाई
चाहो तो वहीं रंगाई, पुताई।
खुद की या दूसरे से कराई।
और! न जाने कितने सेवा के कार्य भरे पड़े हैं
जिनसे तुम अपनी सेवा की ललक मिटा सकते हो।
सेवा क्या होती है करके दिखा सकते हो।
भैया सेवा का क्षेत्र बहुत लम्बा है जितना चाहे दौड़ सकते हो।
अपने कुभावों तक को सेवा की ओर मोड़ सकते हो।
अब बोलो तुम्हारा समस्या क्या है?
तुम्हारी की आख्या व व्याख्या क्या है?
अब नेता जी का पहले तो चेहरा उतर गया,
मानो सेवा का भूत उतर गया।
वे थोड़ा मुस्कराये।
धीरे से अपने दांत चमकाये।
मुझसे बोलने को अधर खोले।
और! नपे तुले सेवा के पृष्ठ खोले।
भैया तुमने जितनी सेवा गिनाई हैं
वे सभी ही कल्याणकारी हैं,
किन्तु इनमें अपनी ही भलाई सारी है।
इन सेवा कार्यों में अनेक लोग लगे हैं।
पर इन सेवाओं से जनता के भाग्य कहाँ जगे हैं?
मेरी सेवा का क्षेत्र इनसे कहीं अधिक व्यापक होगा।
वो सेवा जन-हितों की साधक है।
मैं तो भईया चुनाव जीतकर किसी विधानसभा या लोकसभा की शोभा बढ़ाना चाहता हूँ।
सेवा कैसे की जाती है, यह सभी को बताना चाहता हूँ।
मैं सरकारी बंगले में कीमती मोटे पर्दे, चमकीले फर्श, मोटे झाड़फानूस,
ए.सी. व नई-नई फोटो लगाकर यह बताना चाहता हूं
कि यदि मेरे मार्ग पर चलोगे,
तो ऐसे ही बंगलों में मौज करोगे।
मैं मात्र टेलिफोन पर बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल कर सकता हूं।
मेरे में वो ईश्वरीय गुण हैं कि
मैं भाषण से ही पेट भर सकता हूं।
मैं अपने देश के जितने भी तीर्थस्थान हैं
जो अब तक पड़े वीरान हैं।
उनमें नई ऊर्जा भर सकता हूं।
मैं जिस भी सरिता में स्नान कर लूँ उसको किसी भी मैल से
मुक्त कर सकता हूं।
में इस अपने देश के नागरिकों को उनके कल्याण का मार्ग दिखाना चाहता हूं।
मैं विदेशों में जाकर सेवा की नई-नई तकनीक सीखकर अपने राष्ट्र का निर्माण करना चाहता हूं।
मैं वायुयान, ट्रेन, कार, बस की
मनोरम यात्रा से बता सकता हूं कि कहाँ पर सुधार हुआ है और
कहां सुधार की जरूरत है।
कौन-सी आदिम युग की और कौनसी नूतन मूरत है।
मुझे लोग समझ ही नहीं रहे कि मैं युग निर्माता हूँ।
मैं अपने में सब ही गुण पाता हूं।
मेरे देश में जो किसान भाई तकनीक अपनाते हैं
वह अत्यन्त पुरानी हैं।
आज के काल में सभी बेमानी हैं।
मैं विदेश से नई तकनीक लाऊंगा।
हर फसल की पैदा दूनी कर दिखाऊंगा
मैं वो सभी कार्य करना चाहता हूं
जिससे देश का भला हो।
हर कार्य में एक नूतन कला हो।
मैं वो सभी कार्य करूंगा जिनमें सुधार जरूरी है।
अब तक की हर कोशिश दिख रही अधूरी है।
मैं सरकारी कैन्टीन में भोजन कर गुणवत्ता परखूँगा।
मैं भोजन निर्माण में नई तकनीक भर दूंगा।
मैं ऊँचे, भवन, पुल, मार्ग के निर्माण में गुणवत्ता को बढ़ाऊंगा।
मैं अपना कट्टर ईमानदारी का डंका बजवाऊंगा।
अब मेरे मित्र तुम ये बताओ
जब मैं अपनी प्यारी जनता का इतना भला करूँगा।
तो क्या मैं भूखा मरूंगा।
क्या मैं अपने लिए कुछ नहीं करूंगा।
क्या मैं अपनों की नजरों में गिरूँगा।
मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरे रिश्तेदार भी तो जनता हैं।
उनके लिए कुछ करना क्या अन्याय बनता है।
नेता जी ने और भी ज्ञान बिखेरा।
मुझे सेवा की नई व्याख्या
से लगने लगा भविष्य में अंधेरा।
मैंने कहा चलो ठीक है जो तुम्हारे भाव है काफी प्रगतिशील हैं।
तुम्हारी नजरों में यह न्यायोचित डील है।
पर नेता जी ये तो बताओ
आप तो अधिक पढ़े-लिखे भी नहीं हो कैसे संभालोगे।
कैसे पढ़े-लिखों की श्रेणी में खुद को ढालोगे।
वह खिलखिलाकर हँसे।
जैसे मेरी नादानी पर व्यंग्य कसे।
बोले इतने बड़े-बडे विश्वविद्यालयों में जो हम ज्ञान की गंगा बहायेंगे।
वहीं से तो अपने साथ हम इनके ज्ञान का लाभ उठायेंगे।
ये सब सरकार की नहीं हमारी सेवा करेंगे।
हम तो इनके लिखे को ही शिरोधार्य करके पढेंगे।
और जनता में अपना नाम रोशन करेंगे।
हम आगे बढ़ेंगे चुनाव जीतकर
जनता के भाग्य निर्माता बनेंगे।
मैं बोला ठीक है नेता जी।
ऐसे ही चुनाव जीतकर जनता की सेवा करते रहिये।
और! अपनी आत्मा बेचकर ईश्वर तक की नज़रों में
महान संत बनते रहिए।
रचनाकार
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
प्रस्तोता









टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें