सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संवेदनशीलता संबंधी उलझन - सब कुछ जानकर भी यदि कुछ न जानने जैसा माहौल प्रतीत हो, तो यह कौन-सी स्थिति है? कहीं यह हमारे सामान्य ज्ञान को न जानने या फिर न जानने देने वाले परिवर्तित माहौल का दुष्परिणाम तो नहीं?

सुलझन

हम अपने जीवन में बहुत सारी घटनाएँ देखते हैं, बहुत सारी बातें सुनते हैं। उनमें से अपने काम की बातें ध्यान में लेते हैं, बाकी को नजरअंदाज कर देते हैं। हम सभी घटनाओं और बातों का संज्ञान नहीं ले सकते। सभी लोग अपनी रुचि और रुझान के अनुसार अलग-अलग बातों पर ध्यान देते हैं। यदि मैं अपनी पत्नी के साथ बस में यात्रा कर रहा हूँ तो पास से गुजरने वाले वाहन में किसी महिला या पुरुष ने कैसे कपड़े पहने हैं, इसमें मेरी कोई रुचि नहीं, लेकिन मेरी पत्नी उसे ध्यान से देख लेती है। मैं अमूमन गाड़ी के नंबर देख लेता हूँ। उससे पता चलता है कि वाहन किस राज्य और किस जिले का है। मेरी पत्नी को वाहन के नंबर में कोई रुचि नहीं। इस तरह, हम दोनों की संवेदनशीलता के विषय अलग-अलग हैं और हम अपनी-अपनी रुचि के विषय ग्रहण करते हैं।

समस्त विविधताओं के बावजूद हम मानते हैं कि कुछ गतिविधियों, घटनाओं आदि के प्रति हम सभी को संवेदनशील होना चाहिए। अगर कोई मदद के लिए पुकार रहा हो, कोई भूखा हो, किसी पर अत्याचार हो रहा हो, कोई अन्याय कर रहा हो तो ऐसी घटना का हम सभी पर कुछ न  कुछ असर होना चाहिए। लेकिन एक बड़ी आबादी इस तरह की घटनाओं के प्रति किसी भी तरह की संवेदनशीलता नहीं दिखा रही है, मानो यह घटना उनके सामने हो ही नहीं रही है। यह जानकर भी नहीं जानना, देखकर भी नहीं देखना, सुनकर भी अनसुना कर देना सामान्य तो होता जा रहा है पर सामान्य नहीं है। हम चयनित संवेदनशीलता के युग में जी रहे हैं। यदि बस में कोई जान-पहचान वाला मिला तो हम उसे सीट देने के लिए उठ जाएँगे, वरना महिला चाहे बच्चा गोद में लेकर खड़ी हो या कोई बुजुर्ग खड़ा हो, हम अपरिचित के लिए सीट नहीं छोड़ते। यदि हमारी जाति या धर्म के व्यक्ति पर अत्याचार की खबर आती है तो हम अति संवेदनशील हो जाते हैं, वरना हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हमारी बिरादरी का व्यक्ति दूसरों पर अत्याचार कर रहा हो तो हम विरोध नहीं जताते, अनदेखा कर देते हैं।

जीवन में संवेदनशीलता का अभाव अनेक कुतकों और संघर्षों को जन्म दे रहा है। इसमें वे लोग ज़्यादा पिस रहे हैं जो व्यक्ति को देश, जाति और धर्म के दायरे में नहीं देखते। जो लोग सोचते हैं कि किसी भी तरह का अन्याय, चाहे वह किसी ने भी किया हो, गलत है, वे अपनों के बीच भी पराए से हो जाते हैं। एक संस्कृत श्लोक है - 

धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्। महाजनो येन गतः स पन्थाः। 

अर्थात् धर्म का रहस्य अत्यंत गूढ़ होने के कारण सभी व्यक्तियों के लिए उचित-अनुचित में अंतर कर पाना सहज नहीं है, इसलिए वे सहज ही बड़े यानी प्रतिष्ठित व्यक्तियों का अनुसरण कर लेते हैं। बड़े लोग जैसा व्यवहार करते हैं, वह धीरे-धीरे रीति बन जाती है। वर्तमान वातावरण के निर्माण में ऐसे लोगों का बड़ा योगदान है जिन्हें आजकल की भाषा में इन्फ्लुएंसर कहते हैं। वे लोग जिनका ज्ञान से, मनुष्यता से, सेवा से, मार्गदर्शन से संबंध नहीं रहा है, वे आजकल हमारे समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं। वे जनता के गलत मार्ग पर चलने से परेशान नहीं हैं और जनता का अंधानुकरण उन्हें बुरा नहीं लगता। एक बड़ी आबादी जाने-अनजाने उन्हीं से मार्गदर्शन प्राप्त कर रही है। इस खतरनाक स्थिति का वर्णन करते हुए पंजाबी कवि पाश ने 'सबसे खतरनाक' कविता लिखी थी। उस कविता के हिन्दी अनुवाद की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है 

सबसे ख़तरनाक नहीं होता 

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है ......... 

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना 

तड़प का न होना, सब कुछ सहनकर जाना 

घर से निकलना काम पर 

और काम से लौटकर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।

हम करीब ऐसी ही स्थिति में जी रहे हैं जहाँ हम सामान्य संवेदनशीलता से किनारा करते जा रहे हैं। कई लोग अपनी संवेदनशीलता इस डर से प्रकट नहीं करते कि उन्हें विरोधी मान लिया जाएगा और बाकी समूह से अलग- थलग कर दिया जाएगा। यदि हम चाहते हैं कि लोग जानकर भी अनजान न बनें, उदासीन न हों और सुना- अनसुना न कर लें तो परस्पर विरोधी विचारों को सम्मान के साथ सुनना होगा, विरोधी को दुश्मन की तरह देखने की प्रवृत्ति से बचना होगा और ज्ञान का सम्मान करना सीखना होगा। यह सही है कि सोशल मीडिया ने सभी को समान रूप से अभिव्यक्ति के लिए अवसर प्रदान किया है, लेकिन उसके माध्यम से भीड़तंत्र कहीं इतना बेकाबू न हो जाए कि भिन्न विचारों के लिए स्थान ही न बचे। भारतीय सभ्यता में हमेशा विभिन्न प्रकार के विचारों के लिए स्थान रहा है। विचारों के मंथन से गुजर कर ही भारतीय मनीषियों ने वेद, पुराण और अन्य शास्त्र लिखे हैं। हमें पुनः ऐसा माहौल बनाने पर ध्यान देना चाहिए जहाँ संवेदनशीलता और अलग-अलग विचारों के लिए स्थान हो ताकि भारत पुनः विश्वगुरु बन सके। हिन्दी के एक बड़े कवि कुँवर नारायण की एक कविता है-

असहमति को अवसर दो

सभ्यता को आचरण दो

कि बुद्धि सिर ऊँचा रख सके....

उसे हताश मत करो काइयाँ तर्कों से हरा-हराकर ।

अविनय को स्थापित मत करो

उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं

मनुष्य की साहसिकता।

अमूल्य थाती है यह सबकी

इसे स्वर्ग के लालच में छीन लेने का

किसी को अधिकार नहीं...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...