साथियो!
झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की प्रदर्शनी में पद्मश्री से विभूषित मानव संपदाओं को आमंत्रित किया गया। उन्होंने बातचीत में अपने विचार व्यक्त करते हुए सुझाव दिए।
इनमें से एक कमल सिंह चौहान (गांव अरना, जिला सोनीपत, राज्य हरियाणा) से आये थे। उन्होंने 1998 में बेबीकॉर्न 🌽 की खेती पहले स्वयं की और फिर उनसे प्रेरित होकर पड़ोस के किसानों ने तथा फिर पूरे गांव ने एवं फिर पूरे क्षेत्र ने शुरू की। इस समस्त प्रक्रिया में उनका योगदान तकनीकी परामर्श देना और मार्केटिंग को समझाना रहा।सबसे पहले बेबीकॉर्न 🌽 को फाइव स्टार होटलों को और फिर आसपास के बाजार में बेचा गया तथा फिर आजादपुर सब्जी मंडी में बेचा। तत्पश्चात प्रोसेस इंडस्ट्री को बेचना शुरू किया। जब प्रोसेस इंडस्ट्री ने लेने से इंकार किया तो हमने अपनी प्रोसेस यूनिट लगाने का निर्णय लिया और पहली प्रोसेस यूनिट 2009 में लगाई, तो दूसरी 2012 में लगाई। जब हिम्मत बढ़ी तो तीसरी 2016 में और चौथी 2019 में लगाई। इससे 500 से अधिक स्थानीय महिलाओं को लोकल स्तर पर रोजगार मिला और 10,000 किसानों की आमदनी दुगुनी ही नहीं चार गुनी तक बढ़ी। इसीलिए पद्मश्री सम्मान से उनको सम्मानित किया गया और इसी के साथ उन्होंने किसानों को चार फसलों का नियत गारंटी मूल्य दिया। जिसमें टमाटर, बेबी कॉर्न 🌽, स्वीट कॉर्न और मशरूम थे, जिनको कि हम प्रोसेस करते हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में अच्छी दालें होती हैं। तिलहन और दलहन बहुत अच्छी कृषि फसलें हैं, जो यहां अच्छी गुणवत्ता की हो सकती हैं। एपीओ के माध्यम से इनको प्रोसेस करवाकर इनको मार्केट में भेजा जाए, तो यहां किसानों की आमदनी पर्याप्त बढ़ सकती है।
अन्य पद्मश्री मोहिनी मोहन मिश्रा भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय महामंत्री हैं और दिल्ली में रहते हैं। कुल मिलाकर जितने बीजों का चलन है देश में इन बीज की सारी तैयारियां किसानों ने की थीं। कंपनियों या सरकार ने थोड़ा-बहुत सुधार करके उसको अपने कब्जे में ले लिया और वह किसानों को ही बेच रहे हैं और लाखों करोड़ रुपया उसमें किसानों का कंपनी के जेब में जा रहा है। किसी भी कंपनी ने अपना बीज नहीं बनाया। जैसे अपने देश में इस प्रकार ही बेगुन का बीज चलता था। अभी उनमें से कुछ को सुधार करके वे लाखों करोड़ कमा रहे हैं। लाखों-लाख करोड़ का बीज का पैसा कंपनियां किसान की जेब से ले रही हैं, जबकि बीज किसान का स्वयं का होना चाहिए। इसलिए किसानों को दोबारा प्रशिक्षित कर अपना बीज बनाने के लिए सरकार के जितने कृषि आधारित संस्थान हैं जिनमें करीब 115 सेंट्रल रिसर्च स्टेशन, 750 से अधिक कृषि विज्ञान केंद्र, ऐसे करके 70 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। ये सारी संस्थाएं बीज उपलब्ध करायें किसानों को, क्योंकि सरकार से उनको वेतन भी मिलता है। ये अच्छा बीज बनाकर किसान को दें, फिर किसान अपना बीज बनायें। वहीं से सारी समस्या का समाधान आएगा।
फसल बहुत हद तक मिट्टी के स्वास्थ्य पर आधारित है। इस क्षेत्र में और मृदा के स्वास्थ्य पर काम करने वाले पद्मश्री सेठपाल सिंह हैं, जिनका गांव नंदी फिरोजपुर, जनपद सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) है। इनका सोचना था कि मृदा में ऐसा क्या किया जाए कि उसका स्वास्थ्य बेहतर हो। इस पर सेठपाल जी ने काम किया है। सेठपाल जी ने अपनी बात आरंभ करने से पहले तो धन्यवाद व्यक्त किया और कहा कि आज हम झांसी की उस पवित्र धरा पर एकत्र हुए हैं जो महारानी लक्ष्मीबाई जी के त्याग, पराक्रम और शौर्य की प्रतीक है और इसकी कि राष्ट्र सम्मान के लिए उन्होंने अपने प्राणों का बलि दी। उस पवित्र धरा पर इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में आकर हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। आपने पूछा है कृषि स्वास्थ्य अर्थात् जमीन के स्वास्थ्य की बाबत तो मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारी जमीन को या हमारी फसल को हमारे उत्पाद को कुल सत्रह पोषक तत्वों की जरूरत होती है और यदि हमारी मृदा का स्वास्थ्य खराब है तो उसमें उगने वाली तमाम फसलें भी रोगी होंगी। यदि हम अपनी मृदा में जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ाएंगे और फसल अवशेष प्रबंधन करेंगे, हरी खाद करेंगे, तो उससे जीवांश कार्बन की मात्रा में वृद्धि होगी। जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ाने के लिए हमको फसल अवशेष प्रबंधन करना ही पड़ेगा तथा फसल चक्र भी अपनाना ही पड़ेगा। हरी खाद का समावेश करना पड़ेगा, जल प्रबंधन को अपनाना पड़ेगा और उसके बाद में हमको दलहन और तिलहन का समावेश करना पड़ेगा, क्योंकि जब हम दलहन की खेती करते हैं तो रासायनिक खाद के बजाय जो वायुमंडल से नाइट्रोजन फिक्सिंग करके हमारे पौधे अपनी जड़ों में गांठी बनाकर के जो अप्रत्यक्ष लाभ हमको देते हैं जिससे अगली फसल में हमें नाइट्रोजन की जरूरत कम पड़ती है। उसके पत्ते मृदा में मिलकर के उसको फसल चक्र में आकर के हमारी जमीन का जीवांश कार्बन बढ़ा देते हैं। अतः जब मां का स्वास्थ्य उत्तम होगा, स्वस्थ होगा तो हमारी जो आने वाली फसलें अर्थात् बच्चे हैं वो भी तंदुरुस्त होंगे। रासायनिक खादों तथा रासायनिक दवाइयों के ऊपर हमारी निर्भरता कम होगी। हमारा मित्र कीट और शत्रु कीट जो प्रकृति ने बनाया है वह संतुलन बना रहेगा तो इससे निश्चित रूप से हमारी अर्थात् किसान की आमदनी बढ़ेगी। हमारी भूमि का स्वास्थ्य उत्तम होगा तो उत्पादित कृषि उत्पाद की गुणवत्ता भी अच्छी होगी। सेठपाल जी को पद्मश्री सम्मान 22 मार्च, 2022 को महामहिम राष्ट्रपति जी ने दिया था।
चलिए आशा करते है आप सभी ऐसे अच्छे काम करते रहेंगे और आप हमारे सभी किसान भाइयों के लिए प्रेरणा स्रोत तो हैं ही साथ ही साथ आपके कार्यों को अपनाकर वो अपनी मृदा को और बेहतर बना पाएंगे।
साथियो! अमूमन जब बात आती है किसान की, तो उसकी सबसे पहली छवि जो आंखों के सामने उभरती है वो ऐसी होती है कि मैले से कपड़े, हाथ-पांव मिट्टी से अटे हुए लेकिन हमारे साथ एक ऐसे किसान मौजूद हैं जो वीआईपी श्रेणी के कहे जा सकते हैं। साथ ही साथ वो पद्मश्री भी हैं। आइए बात करते हैं उनसे और जानने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने किसानी के क्षेत्र में ऐसा क्या किया कि उनके कार्य को सरकार ने ना केवल सराहा बल्कि उनको पद्मश्री से नवाजा भी। ये चंद्रशेखर सिंह रघुवंशी हैं। ये एक किसान हैं और एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक दो साल कचहरी में गये, लेकिन उनका मन नहीं लगा क्योंकि खेती से उनको बड़ा लगाव था और वो आखिर खेती में ही जुट गए। नए नए प्रयोग नया नया अनुसंधान करके उन्होंने करीब करीब दस किसमें रजिस्टर्ड करा ली हैं। और! धान की प्रजातियों पर शोध कार्य कर रहे हैं। साथ ही साथ किसान की आय कैसे बढ़े? और उसका सम्मान कैसे जो है वापस आवे? इसके लिए ये प्रयास करते रहे हैं और इसी क्रम में उन्होंने अपने गांव में सीड प्रोसेसिंग प्लांट लगाया। उन्होंने बुंदेलखंड के किसान भाइयों से अपने जीवन के अनुभव साख करते हुए कहा कि किसान यदि केवल उत्पादन कर देगा तो उसकी हालत नहीं सुधरेगी। किसान को उद्यमी बनना होगा। अकेले कर सकते हैं या समूह बनाकर अथवा पीओ बनाकर अपने उत्पाद की पैकिंग, ग्रेडिंग और प्रोसेसिंग करें। फिर ब्रांडिंग और मार्केटिंग करें। तब जाकर आपको सही और लाभकारी मूल्य मिल सकेगा। तब आप एक सफल और संपन्न किसान माने जाएंगे और वही काम उन्होंने करके दिखाया है। उन्होंने बताया कि पिछले साल हमारे प्लांट का टर्नओवर ऑन पेपर पांच करोड़ रहा है। किसान अगर चाहे और यदि उसके पास विल पावर हो और वह ठान ले, तो कुछ भी असंभव नहीं। उन्होंने उसको करके दिखाया है। अपने गांव के कितने ही लोगों को उन्होंने रोजगार दिया। उनके यहां कम से कम सैकड़ों लोगों को सीजन में रोजगार मिलता है।वो सबको काम मिलना सुनिश्चित करते हैं। उनका गांव एक सीड विलेज के नाम जाना जाता है। बहुत दूर दूर से किसान आते हैं बीज खरीदने के लिए और बड़े बड़े डीलर व विक्रेता भी उनके यहां से आकर बीज ले जाते हैं और अच्छा यह है कि वे गुणवत्तापूर्ण बीज किसानों को दे रहे हैं।
यह थे पद्मश्री चंद्रशेखर जी, जिन्होने बताया कि सीड विलेज के रूप में उनका गांव जाना जाता है और सीड पर काम करने से सीड का क्रय, विक्रय और पैकेजिंग करके उसको बाजार जाकर बेचने से किसान अपनी हालत में सुधार कर सकते हैं। खेती के लिए सबसे महत्व की चीज है जल प्रबंधन। आपको यदि जल प्रबंधन आ गया तो यह खेती में आपको बहुत सहायक मददगार होता है।
ऐसे ही हमारे साथ जलयोद्धा पद्मश्री बांदा से उमाशंकर पांडे सर हैं।उनका कहना है कि कैसे जल प्रबंधन करें। अपनी खेती को ठीककर हर किसान अपने खेत पर मेड़ बनाए तथा मेड़ पर पेड़ लगाए। गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में, जंगल का पानी जंगल में और घर का पानी घर में बगैर सरकार की सहायता के समुदाय के आधार पर पुरखों ने जिस तरह जल जोड़ने के बेजोड़ तरीके बनाए। उस ही आधार पर हमको भी जल बचाना होगा और पेड़ लगाने होंगे। जब पानी है तब किसानी है। इसलिए मैं आपके बुंदेलखंड कनेक्शन चेनल के माध्यम से और आपके माध्यम से आम आदमी से, छात्रों से, दैनिक जीवन में जल का रोज उपयोग करने वाली जो हमारी माताएं बहनें हैं उन सबसे निवेदन करूंगा कि पानी की एक एक बूंद बचाएं। पानी यानि जल ही जगदीश है, पानी ही परमेश्वर है।
वैभव सिंह का आग्रह
ये थे हमारे साथ सभी पदमश्री। आपने एक एक कर उनकी बातें सुनीं। कहीं ना कहीं हमें लगता है कि बुंदेलखंड के किसान भाइयों के लिए इनकी ये बातें कहीं ना कहीं हितकारी सिद्ध होंगी अगर स्थानीय कृषक उनके मॉडल को अपनाते हैं। भाईयो! यदि आपको यह विवरण अच्छा लगे तो अपने किसान भाइयों तक इस इसके लिंक को अवश्य पहुंचाए।
बुंदेलखंड कनेक्शन के वैभव सिंह द्वारा तैयार यूट्यूब वीडियो से साभार एक संशोधित समाचार









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