श्रृद्धा-सुमन १
साथियो! सृष्टि में मानव जीवन के क्षणभंगुर होने का एहसास होने के बावजूद भी इंसान यदि अपनी काबिलियत का शत-प्रतिशत देने का प्रयास करता है तो यह मौलिक जीवन लक्ष्य के प्रति उसका समर्पण है। एक ऐसी ही मानव संपदा ऋषिकुमार शर्मा जी की स्मृति में प्रस्तुत कविता हमारी भावनाओं के अनुरूप इसके रचनाकार श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण जी के सौजन्य से आपके सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है ताकि उनके जीवन ध्येय सेवा भाव को हमारे मध्य स्मृति रूप में सदैव बनाए रखा जा सके।
एक अद्भुत व्यक्तित्व
श्री ऋषि कुमार शर्मा जी
झर गया एक पुष्प खिलता,
लग रही बगिया उदासी।
आपके आशीष को अब,
आत्मा सबकी है प्यासी।
विरह की उलझन में जन-जन,
आज उलझा दिख रहा है।
आप ही ने हम सभी की
जिन्दगी तो थी तराशी।
श्रद्धांजलि हम दे रहे हैं,
अश्रु नयनों में भरे हैं।
आपकी केवल दया से,
विश्वास अंतस में भरा है।
भूल ना पायेंगे हम तो,
याद हृदय में रहेगी।
आपके आशीष ने ही
कल्याण हम सबका करा है।
मधुसूदन शर्मा और राजीव
(सर्वोदय कॉलोनी, मेरठ)
श्रद्धा सुमन २
एक समर्पित मानव संपदा
श्री लायक सिंह जी
साथियो! सृष्टि में मानव जीवन क्षणभंगुर है। एक ऐसी ही मानव संपदा की स्मृति में प्रस्तुत कविता हमारी भावनाओं के अनुरूप इसके रचनाकार श्री कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण जी के सौजन्य से आपके सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है ताकि देश में अतिविशिष्ट सुरक्षा बल की सेवा कर हमारे मध्य से चले गए लायक सिंह जी का स्मरण हमारे मध्य सदैव बना रहे।
जन-जन के प्रेरक थे,
लायक सिंह जी ज्ञानी-ध्यानी।
नूतन राह दिखाई सबको,
बात सभी ने उनकी मानी।
आज गये बन वे द्युलोकी,
हुई स्वयं की नश्वर काया।
ईश्वर ने अपने चरणों में,
बड़े प्रेम से उन्हें बिठाया।
पर सेवा में लिप्त सदा ही,
उनको इस धरती पर पाया
कठिन कर्म करते भी देखा,
मुख उनका पल पल मुस्काया।
आज दु:खी हर परिवारी है,
और! दु:खी दिखता जन-जन है
श्रद्धांजलि उनको देता है,
पत्र यह 'उलझन सुलझन' है।
(राजीव के भावों के अनुसार)
योजनाकार
ओमप्रकाश (दिल्ली) व राजीव (मेरठ)
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