साथियो! कर्म हिंदू मूलतः एक अवधारणा है, जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण के सिद्धांत की व्याख्या करती है, जहां पिछले हितकर कार्यों का हितकर प्रभाव और हानिकर कार्यों का हानिकर प्रभाव प्राप्त होता है, जब इसको समझने और समझाने के ध्येय से शब्दशिल्पी कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण से आग्रह किया गया तो देखिए उन्होंने अपने भाव निम्न प्रकार व्यक्त किए।
कर्म कोई भी पूर्ण जगत में नहीं कभी छोटा होता है।
लेकिन झूठ कपट है जिसमें कर्म वही खोटा होता है।
कर्म किये बिन कोई मानव नहीं कभी भी रह सकता है।
लेकिन करके कर्म अकर्मी अधर्म मार्ग पर बह सकता है।
कर्मों में जब भाव धर्म के मिल जाते हैं स्वयं समाये।
तब समझो ईश्वर के उस पर दोनों हाथ रखे हैं पाये।
ईश्वर की कृपा का फिर तो नहीं कभी टोटा होता है।
लेकिन झूठ-कपट है जिसमें कर्म वही खोटा होता है।।१।।
ईश हमारे जन्म साथ ही छूट हमें कर्मों की देते।
मान इसे हम लूट कर्म की राह छोड़ धर्मों की देते।
यहीं चूक करता है मानव भले-बुरे का ज्ञान भुलाकर!
ज्ञान-ध्यान जो दिया ईश ने उसको अपने हिय सुलाकर।
फिर भी करते ईश क्षमा जो खोटों से लौटा होता है।
लेकिन झूठ-कपट है जिसमें कर्म वही खोटा होता है।।२।।
कर्म करे जो भी है मानव उसका होता उसे ज्ञान है।
पुण्य कर्म या पाप कर्म है उसका होता उसे भान है।
ईश्वर सबके कर्मों का ही रखते पूरा लेखा-जोखा।
पुण्य उसी का जुड़ जाता है जो भी कर्म हुआ है चोखा।
फल उसको वैसा मिलता है फसल कोई जैसी बोता है।
लेकिन झूठ-कपट है जिसमें कर्म वही खोटा होता है।।३।।
कर्म किया ईश्वर को अर्पण पुण्य कर्म स्वतः बन जाता।
फिर तो कोई कर्म खोट का मानव नहीं कभी कर पाता।
सच्चे मन से कर्म सत्य का ईश्वर की पूजा होता है।
सत्कर्मों से ही तो मानव बेल धर्म जग में बोता है।
मानव जीवन सफल धरा पर धर्म कर्म से ही होता है।
लेकिन झूठ कपट है जिसमें कर्म वही खोटा होता है।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
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