आज दो जनवरी के दैनिक भास्कर समाचार पत्र में न्यूजीलैंड के एक विशेष विद्यालय के बारे में पढ़ा। इसे 'नेचर विद्यालय' नाम दिया गया है, जिसमें प्रकृति की गोद में रहकर बच्चों का शिक्षण होगा। निसर्ग के सान्निध्य में नैसर्गिक विकास। क्रिया आधारित गतिविधियां भी होंगी। उनकी चिंतन दृष्टि के आधार पर लिखा है कि मिट्टी और पानी से कीचड़ से भी बच्चे खेलेंगे, और सीखेंगे।
हमारी परंपरा में हमने इसे पांच तत्व कहा है। मृदा, जल, अग्नि, वायु व आकाश जैसे पांच तत्वों के सान्निध्य में पंचकोश के आधार पर व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की संकल्पना। तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली में इसका विस्तार से वर्णन है।
नेट पर सर्च करने पर ऐसे और भी बहुत सारे विकल्प प्रयोग सामने आए। कहीं पर फॉरेस्ट स्कूलिंग नाम दिया गया है तो कहीं पर नेचर स्कूलिंग या जंगल विद्यालय। इन नए प्रयोगों में सप्ताह में एक दिन प्रकृति की गोद में रहकर क्रिया आधारित शिक्षण की संकल्पना है। एक प्रकार से अपनी बैग फ्री सैटरडे योजना का अंतरराष्ट्रीयकरण हो गया है। बस्ता मुक्त शनिवार की अपनी मूल संकल्पना ऐसी ही है।
अत्यंत प्राचीन काल से भारत में शिक्षा का जो मॉडल था, वह यही तो था, गुरुकुल पद्धति।
गुरुकुल पद्धति अर्थात प्रकृति के सान्निध्य में रहकर अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने की हमारी अपनी शिक्षा पद्धति। तरह-तरह की शिक्षण पद्धतियों से घूम-फिरकर दुनिया उस ओर आने लगी है। इस ओर आना ही पड़ेगा। इसी से जीवन सुरक्षित और संरक्षित रहेगा। इसी से पर्यावरण संरक्षण होगा, इसी से कौशल विकास होगा और बेरोजगारी मिटेगी। इसी से मानवता बचेगी। इस मार्ग पर चलकर ही जड़ चेतन चराचर जगत का स्थायित्व बचा रहेगा।
✒️ ...... संदीप जोशी
*भारत की ओर लौटो*
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