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क्रूरता की गाथा

'क्रूरता की पराकाष्ठा'

ऋषिपाल सिंह

मित्रो! आप लोग विविध समाचार-पत्रों में विगत दो दिन से एक हृदय विदारक घटना पढ रहे होंगे! एक स्टार्टअप 'माइंडफुल' कम्पनी की सीईओ सूचना सेठ ने गोवा में अपने चार वर्ष के बच्चे की गला दबाकर केवल इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसे अदालत के आदेश पर सप्ताह में एक बार बच्चे के पिता और सूचना सेठ के पूर्व पति से बच्चे को मिलाने कोर्ट जाना होता था। क्रूरता की हदें पार करते हुए यह महिला बच्चे के मृत शरीर को एक सूटकेस में भरकर टैक्सी से बैंगलुरु ले जा रही थी। जब फ्लैट में सफाई कर्मचारी को खून से सना तौलिया मिला, तब उसके सूचित करने पर गोवा पुलिस के द्वारा सूचना सेठ को टैक्सी में ही पकड़ लिया गया। 

ज्ञातव्य है कि यह महिला 2021 में कृत्रिम बुद्धिमता अर्थात् आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एथिक्स की सौ प्रतिभाशाली महिलाओं में से एक रही है। सेठ के भीतर पनपी यह अनएथिकल और अनैतिक भावना विश्व भर के लिए दिल दहलाऊ और नजीर बन गयी है।  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानि कृत्रिम बुद्धिमता के स्याह पक्ष पर विद्वान पहले से ही संदेह व्यक्त करते रहे हैं। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की महारथी का यह खौफनाक कदम इशारा कर रहा है कि हमें तकनीकी मानसिकता का गहन अध्ययन करना ही होगा। हालांकि किसी भी प्रकार की तकनीक ममता का गला घोंटने जैसा परामर्श नहीं देती। अपने पूर्व पति से प्रतिशोध लेने का श्रीमती सूचना सेठ का यह कदम क्रूरता की सभी हदें पार कर गया है। 

आइए! अब निर्मम  सूचना सेठ की निर्ममता, नारी मन की विशालता और इस हुए कुकर्म को इन कविताओं के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

'निर्ममता'

'सूचना' ने स्वयं के ही पुत्र को है मार डाला। 

क्यूँ किया यह कृत्य उसने कुछ न दे पाई हवाला? 

कुकृत्य पर उसने नकारा कर नहीं पाई खुलासा,

कौन जाने क्या वजह थी जो किया यह कृत्य काला?


क्या कोई यह भेद गहरा जान पाएगा जगत में? 

या सदा को लुप्त होगा जो किया उसने विगत में। 

हो सके है मानसिक वो रोग से ज्यादा व्यथित हो, 

स्वयं का भी हाथ काटा क्या थी खुद मृत्यु जुगत में?

'क्या क्रूर है नारी?' (रचनाकार - कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण)

नारी  करुणा  की  मूरत  है  नारी  क्रूर  नहीं  हो  सकती। 

नारी मन की करुणाई को निज हृदय से नहीं खो सकती।


जो नारी करुणा खो देती ममत्व स्वयं उसका खो जाता। 

हृदय  नहीं  उसका  रहता  है  हृदय  ही पत्थर हो जाता। 

नारी  सहकर  पीर  भंयकर  इस जग को जीवन देती है। 

लख कर पर की पीर सदा ही नारी अंखियां  भर लेती है। 

नारी  तो  रक्षक  होती  है  भक्षक  कभी नहीं हो सकती।

नारी मन की करुणाई को निज हृदय से नहीं खो सकती।।१।।


आज रहा लग कलियुग ने आ खो दी है नारी करुणाई। 

हत्या  कर दी स्वयं जने की दया नहीं बिल्कुल भी आई। 

एक  नारी  ने अधम कर्म कर नारी को बदनाम किया है। 

कर नहीं सकता दानव भी जो ऐसा उसने काम किया है। 

करके  निर्मम  कर्म  चैन  से  कभी नहीं नारी सो सकती। 

नारी मन की करुणाई को निज हृदय से नहीं खो सकती।।२।।


क्या  नारी  नागिन  बन  बैठी  जो अपने अन्डे खा जाती। 

हत्या  जैसे  जघन्य  कर्म  कर  दिखती है हृदय दहलाती। 

नारी  के  तो  नाम  स्वयं  में  सुमनों  जैसी  कोमलता  है। 

नारी  के  अन्तस  में   पलती  संस्कार  की  बाहुलता   है। 

सोचो  क्या  है  बात  नारी में जो निर्मम अंकुर बो सकती। 

नारी मन की करुणाई को निज हृदय से नहीं खो सकती।।३।।


नारी  में  शक्ति  असीमित  यम  से  भी  टकरा सकती है। 

यम  तक  से  तो जीवन जग में नारी मात्र बचा सकती है। 

नारी  ही  देवी  जो  केवल  पापी  जन  को  मिली मारती। 

अपने  भक्तजनों  को  जग में भव सागर से मिली तारती। 

प्रश्न  खड़ा  है  नारी  कैसे  उर  से  करुणाई  खो  सकती। 

नारी मन की करुणाई को निज हृदय से नहीं खो सकती।।४।।

कवि कृष्णदत्त कृष्ण समस्त घटनाक्रम को जान सुनकर अपने भावों को नियंत्रित ना रख पाए और उस अबोध बच्चे का स्मरण कर उन्होंने तत्काल यह रचना भेजी


'कर्म-अकर्मी' (रचनाकार - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण')


कभी कभी मानव जीवन में कर्म अकर्मी कर जाता है। 

करके कर्म अकर्मी जग में जीवन भर ही पछताता है।


एक नारी ने निज सुत मारा क्या वो फिर हर्षा पाएगी।

खाली  हाथ  सदा  वो होगी रोती सदा नजर आएगी।

क्या नहीं वो मन में सोचेगी उसने एक गुणी मारा है। 

क्या कोई महापुरुष मारा या कोई ऋषि मुनि मारा है। 

हृदय विदारक दृश्य सदा ही हृदय को मथता पाता है। 

करके कर्म अकर्मी जग में जीवन भर ही पछताता है।।१।।


उस अबोध बालक की सोचो जिसने केवल चलना सीखा। 

निश्छलता जिसने पाई थी कहाँ किसी को छलना सीखा। 

पूर्व  जन्म  के पुण्य कर्म से उसने मानव योनि पाई। 

लेकिन रहा अभागा जग में मौत स्वयं ममता से पाई।

ऐसी माता को क्या बालक मात कभी भी कह पाता है। 

करके कर्म अकर्मी जग में जीवन भर ही पछताता है।।२।।


वो सपूत निश्चित ही होगा लेकिन उसको मिली कुमाता। 

उसके मन की मौन व्यथा को जान नहीं कोई भी पाता। 

हो सकता था बालक जग को एक नूतन प्रकाश दिखाता। 

या फिर वो पाताल ढूंढकर छुपा हुआ आकाश दिखाता। 

सोच-सोचकर इन बातों को आँसू कौन रोक पाता है। 

करके कर्म अकर्मी जग में जीवन भर ही पछताता है।।३।।


बुध्दिमता कृत्रिम में सुनते वो नारी गुणवान महा है।

कैसे मानें उसमें बुद्धि या थोड़ा भी ज्ञान रहा है। 

उस ईश्वर के खेल निराले किसके हाथों क्या करवा दे। 

लंगड़े को पर्वत चढ़वा कर चींटी से हाथी मरवा दे। 

लिखा भाग्य में किसके क्या क्या जान नहीं कोई पाता है। 

करके कर्म अकर्मी जग में जीवन भर ही पछताता है।।४।।

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