संसार में जो कुछ भी दु:ख होता है वह सब तृष्णा के कारण होता है। तृष्णा आवश्यकताओं से अधिक असीम होती है। उसका कोई अंत नहीं होता। इस पर उम्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वृद्धावस्था आने तक शरीर के अनेक अवयव शिथिल होने लगते हैं, लेकिन एक तृष्णा ही ऐसी है जो वृद्धावस्था में तरुणाई की ओर अग्रसर होती जाती है। उसकी तरुणाई का अहसास जब दूसरे नहीं करते तो वह उदास हो जाती है। मन को हताशा और तनाव से भर देती है, दु:खों से भर देती है। व्यक्ति के जीवन को आनंद विहीन कर देती है। तृष्णा तो एक पुष्प में बैठे एक छोटे से कीट की भांति हृदय में रहकर जागती रहती है। व्यक्ति को घेरे रहती है। अवसर मिलते ही वह उस पर वार करती है। उसे उद्विग्न करती है। (दैनिक जागरण से साभार)
तृष्णा और कर्मों को परस्पर संबद्ध करके अंतिम रूप से कर्मों के अनुसार ही तृष्णा की बाल्टी भरती जाती है। मासिक उलझन सुलझन के आग्रह पर शब्दशिल्पी कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण ने जो कविता तैयार की आइए उसका अवलोकन कीजिए -
जीवन भर ही कभी बाल्टी तृष्णा को नहीं भर पाती है।
जग रूपी ये डूब कूप में भी खाली ही रह जाती है।
जब भी जन्म लिया मानव ने साथ बाल्टी खाली लाता।
जीवन भर ही भरता इसको फिर भी उसको खाली पाता।
अंत समय में जैसी लाया वैसी ही खाली ले जाता।
नहीं भरेगी कभी बाल्टी सीख यही जग को दे जाता।
जैसे-जैसे आयु बढ़ती तृष्णा भी बढ़ती जाती है।
जग रूपी ये डूब कूप में भी खाली ही रह जाती है।।१।।
यह बतलाओ निज जीवन में कौन भला सन्तुष्ट हुआ है।
भाग्य उसे कितना ही दे ले नहीं कभी वो तुष्ट हुआ है।
तृष्णा वन की आग सरीखी लगते ही बढ़ती जाती है।
सन्तोषी वर्षा भी इसको बुझा नहीं बिल्कुल पाती है।
अपनी दिखे बाल्टी खाली पर की भरी नज़र आती है।
जग रूपी ये डूब कूप में भी खाली ही रह जाती है।।२।।
सदा ईर्ष्या जन्मदात्री केवल तृष्णा ही होती है।
जीवन भर का चैन मनुज का केवल तृष्णा ही खोती है।
तृष्णा सदा उनींदी रहती नींद नहीं उसको आती है।
सदा याद सन्तोषी में ही खुद को वो खोया पाती है।
तृष्णा वाली सदा बाल्टी बिन पैंदी पाई जाती है।
जग रूपी ये डूब कूप में भी खाली ही रह जाती है।।३।।
तृष्णा वाली कभी बाल्टी ऋषि-मुनि भी न भर पाये।
भरें बाल्टी ईश भजन से मन में रहते इसे जगाये।
अविजित सदा तृष्णा को पाया जीत नहीं कोई भी पाये।
सुखी दिखे जो इस तृष्णा के पीछे नहीं दौड़ते पाये।
तृष्णा रूपी यह बाल्टी ईश कृपा से भर पाती है।
जग रूपी ये डूब कूप में भी खाली रह जाती है।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
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