सम्मानित मित्रो! सदियों के बाद 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक यज्ञ होने जा रहा है तब बहुसंख्यक हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का ध्यान न रखते हुए खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए कुछ लोग इस भव्य आयोजन में तरह-तरह के दोष ढूँढने का प्रयास करते हुए इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष विरोध कर रहे हैं। अब जब यह तय है कि य़ह आयोजन होना ही है तब किसी भी प्रकार का विरोधी रवैया औचित्यहीन है।इन्हीं भावों को दर्शाती य़ह काव्य रचना आप सभी को समर्पित है।जय श्रीराम, जय हिंद, वन्दे मातरम।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।
पुरुषोत्तम ने मार्ग दिया, जीवन का प्रसाधन है।।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।
राम नाम पे हो हल्ला, खुद को समझे हैं भगवान।
किये विवादित श्रीराम, इंसान है कितना नादान।।
प्राण प्रतिष्ठा श्रीराम की, न नेता का भाषण है।।।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।
अपनी श्रद्धा जाने आप, मानो न मानो भगवान।
वाणी पर संयम रखो, पड़ जाए भारी अपमान।।
लोगों के श्रद्धेय राम हैं, वो ही पतित पावन है।।।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।
धर्मस्थल पर यूँ विवाद, कहीं नहीं पडता है जान।
उच्चतम न्यायालय केवल, दे पाया है समाधान।।
सदियों से वीराना, अब प्रतिष्ठित सिंहासन है।।।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।
राम की मर्जी को न माने, वो ज्ञानी भी है अज्ञान।
बात न हो कोई ऐसी, जिससे घट जाए सम्मान।
देश हुआ है राममय, अवसर ये मनभावन है।।।
राम बसे हैं रोम रोम में, राम-राम अभिवादन है।

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