साथियों!
यदि हम चाहते हैं
'प्रकृति के शांत प्रभाव की खोज करना', और
'सरल समय को याद करना'।
तो आइए जानते हैं कि
इस कार्यशाला 'जीवन' में समस्त मानव संसाधन संचार में और बातों में शब्दों का प्रयोग कर बातों को अर्थपूर्ण बनाने का यथासंभव प्रयास करते हैं। यहां पर हम शब्दशिल्पी कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' की पूर्व में रचित उन कविताओं को संकलित कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं जो शब्दों की संचार में भूमिका व्यक्त करने से लेकर चिट्ठी तक में उनकी भूमिका को स्पष्ट करेंगी।
शब्द
(शब्द की महत्ता को, गतिविधियों को शीशे सदृश स्पष्टता देती रचना को।)
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।
हर तरह का रंग तुम इसमें भरो।।
शब्द केवल शब्द हो ये ध्यान हो।
शब्द का क्या अर्थ है ये ज्ञान हो।।
शब्द से तुम प्यार की बाँहें भरो।
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।।१।।
शब्द से ही शब्द निकले है कला।
शब्द के कारण न द्वापर युद्ध टला।।
शब्द का प्रयोग ढंग से तुम करो।
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।।२।।
शब्द से कोमल न होता फूल भी।
शब्द से तीक्ष्ण न होता शूल भी।।
शब्द से गुणगान ईश्वर का करो।
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।।३।।
शब्द से मिटता परस्पर भेद भी।
शब्द से ही व्यक्त होता खेद भी।।
शब्द का सम्मान मन से तुम करो।
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।। ४।।
शब्द से बिगड़े है बनते खेल भी।
शब्द से होते है देखे मेल भी ।।
शब्द जोड़ो शब्द से रचना करो।
शब्द का आकार तुम ऐसा करो।।५।।
बात
(किसी भी संचार में प्रमुख भूमिका निभाने वाली बात को तथा स्पष्ट आकार देती रचना को।)
बात की तो बात ही क्या बात ही हृदय लुभाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात ही है जिसमें देखा नित नया मिठास होता।
मिठास भी न आम होता हर तरह से ख़ास होता।
विष भरा भी बात में ही इस जगत में दीख जाता।
बात कुछ ऐसी भी होती जिससे मानव खीझ जाता।
बात से ही बात बनती बात से ही बिगड़ जाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
बात से बातें निकलती बात का न अंत होता।
कुछ मधुर बातों का सुख तो जीवनपर्यन्त होता।
अनछुई बातों की मन में एक निराली गन्ध होती।
गन्ध ऐसी ज़िन्दगी में न कभी भी मन्द होती।
मधुर पल की बात कोई उर में रहती है लजाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात कुछ होती अमोली कोई भी न मोल होता।
सब रसों का बात में ही एक नशीला घोल होता।
बात कोई ऐसी होती उदर से न बाहर आती।
वास हृदय में ही करती हर समय ही गुनगुनाती।
बात से जो गाँठ पड़ती बात ही बस खोल पाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
बात ही सुमनों से कोमल बात ही होती नुकीली।
बात में परिहास भी है बात ही होती चुटीली।
किसी छोटी बात का भी दीखता बतंगड़ बनता।
कभी कड़वी बात से ही प्यार तज मुक्का है तनता।
बात ही काली कलूटी बात ही महफिल जमाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात हृदय तोड़ती गर, बात ही उर जोड़ती है।
बात जब बढ़ती भयंकर कहीं का न छोड़ती है।
कोई क्षण ऐसे भी आते बात न मुँह खोलती है।
पर कभी बिन बोल के भी बात सब कुछ बोलती है।
बात की महिमा अनूठी बात ही क्रन्दन कराती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
बात जो भी तोलकर के अपने मुख से बोलता है।
वो ही इस पूरे जगत में प्रेम द्वारा खोलता है।
बात खुशियों का खजाना और ग़म की पोटली भी।
बात में होता वज़न है और होती यह खोखली भी।
बात होती है दयालु जीतकर भी हार जाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।
देश के नेता सदा ही बात मीठी ही बनाते।
बात करके बात अपनी बहुत जल्दी भूल जाते।
बात का विश्वास जिसने खो दिया जीवन में अपने।
वो कभी भी ज़िन्दगी में कर न सकता पूर्ण सपने।
बात सच्ची ही जगत में मान गौरव है दिलाती।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती।
ईश से विनती है मेरी बात न मिथ्या हो कोई।
बात ने प्रतिष्ठा पाई बात ने प्रतिष्ठा खोई।
हम अनैतिक बात कोई इस जगत में ना परोसें।
बात जो भी मुख से बोलें हर तरह से उसको पोखें।
बात कोई भी हमारी ना किसी को हो सताती ।
बात से ही तो मिली है ज़िन्दगी ये मुस्कुराती ।।
मन एक
मन को मैं कैसे समझाऊँ। विधि नहीं कोई भी पाऊँ।
यूं तो गीत बहुत गाता हूँ, पर मन गीत नहीं गा पाऊँ।
जन्मजात मन चंचल होता। हँसता भी है और ये रोता।
ऐसा लगता कभी-कभी तो, बिना बात ही धीरज खोता ।
नयनों से मन रिश्ता गहरा, जब मन कहता नयन बहाऊँ।
यूं तो गीत बहुत गाता हूँ, पर मन गीत नहीं गा पाऊँ।
मन कहता नभ में उड़ जाऊँ। नभ में तारों को छू आऊँ।
नभ में जो छुपकर जा बैठे, उनसे चुपके से मिल आऊँ।
किन्तु यह सब मात्र कल्पना, नहीं पूर्ण इसको कर पाऊँ।
यूं तो गीत बहुत गाता हूँ, पर मन गीत नहीं गा पाऊँ।
मन से ही दुनिया सब हारी। मन से विवश सभी संसारी।
यह मन जब अपनी पर आया, तोड़ भगा है सीमा सारी।
घोर यत्न करने पर भी मैं, मन को नहिं वश में कर पाऊँ।
यूं तो गीत बहुत गाता हूँ, पर मन गीत नहीं गा पाऊँ।
मन करनी ऐसी कर जाता। मन करनी पर मैं पछताता।
घुटता रहता हूँ अन्तस् में, किन्तु नहीं कुछ भी कर पाता।
ईश मुझे ऐसी शक्ति दो, जो इस मन से मुक्ति पाऊँ।
यूं तो गीत बहुत गाता हूँ, पर मन गीत नहीं गा पाऊँ।
मन दो
सागर से भी गहरा देखा जग में मानव मन होता है।
नाप सके न कोई मन को इतना चंचलपन होता है।
जहाँ न पहुँचे किरण रवि की वहाँ भी मन पहुँचा पाया है।
स्वप्नलोक में निशिदिन मन को विचरण करते ही पाया है।
फिर भी मन की चाही जग में किसकी बोलो पूर्ण हुई है।
जिसका ध्यान अधिक रखा है वही चीज ही मिली खुई है।
सपन सलोने सिंचित करके हर दिन ही ये मन सोता है।
नाप सके न कोई मन को इतना चंचलपन होता है।
गाँठ कभी मन में पड़ जाती बड़ी कठिनता से खुलती है।
जैसे मन की मैली चादर बड़ी कठिनता से धुलती है।
मन में पावन भाव सँजोए बिखर अगर अन्तर में जाते।
माला के टूटे मनकों सम नहीं सिमटने में आ पाते।
फिर तो ये चंचल मन तक भी अपने धीरज को खोता है।
नाप सके न कोई मन को इतना चंचलपन होता है।
मन जब उड़ता नील गगन में निज का भूल धरातल जाता।
पर जब होता ज्ञान स्वयं को देखा है मन को पछताता।
योगी, मुनि, यति, ज्ञानी भी मन को वश में नहीं कर पाये।
मन जब दौड़ा उसके पीछे खुद भी दौड़ लगाते पाये।
केवल मन ही नवसृजन का जीवन में अंकुर बोता है।
नाप सके न कोई मन को इतना चंचलपन होता है।
मानव का मन तीन काल को अपने सीने में रखता है।
भूत-भविष्य-वर्तमान का कटु और मधु रस चखता है।
मधुर मिलन और विरह विषैला जब चाहो मन में मिल जाता ।
कभी नहीं इन दो रस से ही जीवन में मन मुक्ति पाता।
पाप-कर्म और पुण्य-कर्म सब केवल मन से ही होता है।
नाप सके न कोई मन को इतना चंचलपन होता है।
शब्दशिल्प की पहल और प्रस्तुति

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