साथियो! जीवन में प्रगति करने के लिए सदैव उपयुक्त मार्ग का चयन करना उचित है। साथ ही आप यह भी जान लें कि मनुष्य मूल रूप से आनुवंशिकता और परिवेश का एक समुच्चय है। इसमें कुछ ऐसा विशेष भी है, जो प्राकृतिक अर्थात् अपरिवर्तनीय है मसलन आपने जहां जन्म लिया है, उसे आप बदल नहीं सकते; पर अपने मजबूत पक्षों को और मजबूत बनाकर कमजोर पक्षों से होने वाली क्षति को कम निश्चित कर सकते हैं। साथ ही, आप जानेंगे तो कर सकेंगे कि विचारों और जीवन-लक्ष्यों में बदलाव करने की सामान्य प्रक्रिया को जानकर अपने जीवन के साथ-साथ पूरे समाज की छवि का कायाकल्प किया जा सकना संभव है।
इस सबको आपके समक्ष कहने और रखने के मूल में कारण यह है कि समाज की खेतिहर जातियों में शुमार गुर्जर जाति समेत ऐसी अनेक जातियां तमाम विकास के बावजूद आज तक भी समाज में विद्यमान हैं जो बेहद मौलिक, सीधी और सरल हैं। उनकी अपनी मानसिक क्षमताएं हैं जिनको विकसित ना होने देने के इस तरह से प्रयास हुए हैं कि उनके मध्य ही से ही ऐसे प्रयास हों और उनकी निरंतरता भी बनी रहे। ऐसा कहने के मूल में वो प्रयास हैं जिन्होंने ऐसे प्रयासों की प्रमाणिकता को सिद्ध किया। गुर्जर समाज के एक प्रतिनिधि की व्हाट्सएप पोस्ट को देखिए -
अब जरा समझिए इस समाज जैसे न जाने कितने समाज सृष्टि में हैं जो निरंतर ऐसे अभियानों में अलग अलग देशों में स्वहित से लगे हुए हैं लेकिन ना तो स्वहित कर पा रहे ना ही जनहित। ऐसा क्यों हो रहा है आइए समझने का प्रयास करते हैं।
इस चित्र के साथ जो लिखा उस से विलग वास्तविकता यह है कि श्री जगदीप सिंह छोकर जी ए.डी.आर. के नौ संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और उनके साथ बाकी आठ भी प्राणपन से अपने कामों में निरंतर लगे रहते हैं। ऐसे में इस टिप्पणी का थोथापन अपनेआप स्पष्ट हो जाता है। गुर्जर समाज सारा श्रेय कैसे ले सकता है? नौ लोगों का सामूहिक प्रयास है ये, तो बाकी आठ भी तो कुछ करते ही होंगे। लेकिन यदि किसी समाज ने सीख लिया गुर्जर गुर्जर करना और किसी ने सैनी सैनी करना तो व्यवहार बचकाना सा और बालसुलभ प्रयास सा लगने लगता है और समाज की नादानी सरीखा भी। और! ऐसी नादानी से प्रतिभा को स्वयं उसका समाज ही अपरोक्ष रूप से हानि पहुंचा देगा यह तय है। जब किसी टास्क में लगे नौ में से अधिकांश लोग साइलेंटली अपना काम कर रहे हों, तो कैसे किसी एक को पूरा क्रेडिट दिया जा सकता है, लेकिन ऐसे क्रेडिट देने वाला इनोसेंटली कह सकता है कि 'मुझको क्या पता?'? क्रेडेंशियल्स को हैक करने वाले समाज के ऐसे लोग खुद तो अपना नुकसान कर ही रहे हैं। वे समाज को भी हानि पहुंचा रहे हैं और दूसरे को दोष देने के लिए ढूंढ रहे हैं। यह विचार का विषय है कि क्या दूसरा कोई भी दोषी बनने के लिए तैयार होगा?
यहां पर एक घटनाक्रम का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है जिसने स्पष्ट किया कि सीमित बुद्धिमता की हानि कितनी हो सकती है और उसका प्रभाव कितना विस्तृत हो सकता है। राजनीति की समझ की दृष्टि से अपरिपक्व राजनीति से प्रभावित ग्रामीण अंचल के एक समूह ने अपने एक परिजन के मनोमस्तिष्क में फीड कर दिया कि उसके स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षित बालक बेकार हैं। जिनके दिमाग में यह फीड किया गया था वो सर्वत्र कहते कि मेरे बालक बेकार हैं। आखिरकार उनके एक पुत्र की उपस्थिति में उनसे जब विविध दृष्टिकोणों से बातचीत हुई तो ज्ञात हुआ कि यह उनके द्वारा स्वयं किया गया आकलन न होकर उनके दिमाग में कह कहकर फीड कर दिया गया एक कपोलकल्पित भ्रम था, उनके परिवार की प्रगति को सीमित रखने की दिशा में किया गया एक दूषित प्रयास। इस उपरोक्त घटनाक्रम में समस्त संबंधित लोगों के क्रियाकलापों से उनकी मानसिक क्षमताओं का स्पष्ट आभास होता है कि उल्लिखित समस्त गतिविधियों को निरर्थक ही किया जा रहा था और इस कृत्य को अंजाम देने वाला कितना जोखिम उठा रहा था और पीड़ित कितनी मानसिक परेशानी की स्थिति में थे। ऐसा प्रयास करने वालों में शुमार एक अन्य व्यक्ति ने पुनः जब एक साक्षरता का प्रमाणपत्र रखने वाले निरक्षर के लिए व्हाइट कॉलर जॉब हेतु बातों द्वारा प्रयास आरंभ किए तो स्पष्ट पता चला कि पुनः एक सीधे व्यक्ति को एक अल्पज्ञानी के लिए रोजगार दिलाने का माध्यम बना उसको समझाया गया है कि बातें किस प्रकार आरंभ करनी हैं।
इस से विलग एक सीनियर सिटिजन श्रेणी के नागरिक अपने शुभेच्छु के पास गए और अभिवादन और प्राथमिक आवभगत के बाद आरंभ वार्ता के दौरान शुभेच्छु से अपने एक निकटतम रिश्तेदार की समीक्षा कर कुछ ऐसी बातें कहने लगे जिनको अमर्यादित की श्रेणी में रखा जा सकता था और उनके शुभेच्छु ने जब इनका ध्यान इस ओर आकर्षित किया तो उन्होंने मसले को समझते हुए खेद व्यक्त करते हुए शुभेच्छु से कहा कि इस से पहले तो मुझको कभी किसी ने इस तरह से नहीं टोका और अब से मैं इसका ध्यान रखूंगा और यह मेरी गलती है और इस गलती को मैं ना जाने कब से करता चला आ रहा हूं।
ये खेतिहर जातियों के मध्य होने वाली वो निरर्थक गतिविधियां हैं जिन्होंने उनके बेगौरे जीवन को स्पष्टता प्रदान करते हुए उनके दुरुपयोग और मखौल के रास्ते खोले हैं और जिनको वे तनिक से अतिरिक्त प्रयास से नियंत्रित कर अपने समाजों के दुरुपयोग को रोक सकते हैं। इनके संज्ञान में आने पर थोड़ी सी भी समझ वाला विमर्श द्वारा ऐसी गतिविधियों की दुहराव की स्थिति से बच सकता है। और! विमर्श के एकल प्रयास सामूहिक में तब्दील हो सकते हैं। ऐसे प्रयास न सिर्फ उनके लिए हितकारी हो सकते हैं बल्कि पूरे समाज के लिए हितकारी हो सकते हैं।
सीमित मानसिक क्षमताओं ने खेतिहर समाजों के अधिसंख्य प्रतिनिधियों को इतना उदासीन और मस्तमौला बना दिया है कि वे समाज में व्याप्त मखौल जैसी कुप्रथाओं और प्रक्रियाओं से भी बेपरवाह रह नैसर्गिक तरीके से उन सीमित मानसिक क्षमताओं के साथ अपना जीवन-यापन करते चले जा रहे हैं। इन जातियों का विशिष्ट गुण उनका सीधापन है जो किसी भी व्यक्ति या समाज के सर्वश्रेष्ठ होने के साथ-साथ उसके मौलिक होने का भी गुण है। यह समाज विशेष के क्रियाकलापों से ही सिद्ध हो जाता है। ये क्रियाकलाप कहने को तो बेहद सामान्य किस्म के होते हैं, लेकिन इन समाजों के विशिष्ट कोटि के प्रतिनिधियों के द्वारा भी करके वे मौलिक सीधेपन को अभिव्यक्ति प्रदान कर देते हैं।
मनुष्य का सदुपयोग करना एक उत्तम कृत्य है पर उसका दुरुपयोग कैसे न्यायसंगत कहा जा सकता है? खेतिहर जातियों को भी पर्याप्त ज्ञान है। सबके व्यवहार का पता है। सबकी चालाकियों को वो समझते हैं पर अपनी अभिव्यक्ति संचारी अज्ञानतावश न करना अथवा कोई प्रतिक्रिया देना न तो वो जरूरी समझते हैं और न ही किसी के भी जीवन में किसी तरह का हस्तक्षेप करना चाहते हैं और अपने साथ हो रहे दुरुपयोग को वो चुपचाप बैठकर निरंतर देख और झेल रहे हैं।
हम सभी को यह जानना होगा आज नहीं तो कल कि पूर्ण समर्पण भाव से ईश्वर आपके हो जाएंगे और सीधेसादे लोगों के लिए केवल और केवल ईश्वरीय स्नेह की जरूरत है। यह सांसारिक विचारों से युक्त व्यक्तियों का दूसरों से कुछ न कुछ प्राप्त करने की आशा से किया जाने वाला और स्वार्थपूर्ण नहीं होता। यह अस्थायी भावों का क्षणिक उद्रेक भी नहीं है। स्नेह की भाषा अश्रुओं की भाषा है। भाग्यशाली अपने अंदर इस मधुर स्नेह का अनुभव करते रहते है। पिपासु भक्त के हृदय में दिव्य स्नेह की ज्वाला अहर्निश जला करती है। उसे अपने अन्न-जल तक की चिंता नहीं रहती।
शब्दशिल्प


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