सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गणतंत्र दिवस पर बबीना में आयोजन

केंद्रीय विद्यालय बबीना का कार्यक्रम

अवसर
पी एम श्री केन्द्रीय विद्यालय बबीना छावनी में दिनांक 26 जनवरी, 2024 को देश के पिच्छत्तरवें गणतंत्र दिवस को उल्लासपूर्वक मनाया गया।
इस अवसर पर मुख्य अथिति के रूप में विद्यालय के प्राचार्य श्री संजय कुमार चौहान जी उपस्थित रहे। स्काउट गाइड एवं एन.सी.सी. कैडेट द्वारा मुख्य अतिथि का हार्दिक स्वागत किया गया।
मुख्य अतिथि द्वारा झंडारोहण के पश्चात विद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। विद्यालय की छात्रा रितुल जैन और अश्विनी साहू ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपने विचार को भाषण के माध्यम से प्रस्तुत किया।
इस अवसर सीसीए विभाग द्वारा विद्यालय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्राचार्य महोदय द्वारा पुरस्कृत किया गया। साथ ही केन्द्रीय विद्यालय संगठन द्वारा आयोजित संकुल, संभागीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने और स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को भी प्राचार्य महोदय द्वारा पुरस्कारस्वरूप चेक प्रदान किए गए।
इस अवसर पर माननीय मुख्य अतिथि ने अपने भाषण में सभी को संबोधित करते हुए गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। 

प्राचार्य का संबोधन

"आज हम अपना 75वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं और  76वें में प्रवेश कर रहे हैं। आज के दिन ही 26 जनवरी 1950 को भारत को अपना संविधान मिला था, जिसको बनाने में हमारे संविधान निर्माता ने दिन-रात एक कर दिया। इसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्य और अधिकारों की बात की गई। यदि हम सब अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करें तो हमें अपने अधिकार अपनेआप ही मिल जाएंगे। जिस प्रकार संविधान ने हमें कर्तव्य के बारे में बताया उसी प्रकार विद्यालय में भी हम सबके अपने-अपने कर्तव्य निर्धारित हैं। शिक्षकों का कर्तव्य है कि वे छात्रों का शिक्षण कार्य विद्यार्थियों की रुचि के अनुसार करें और उसका ज्ञान कक्षा में अंतिम पंक्ति में बैठे विद्यार्थियों तक पहुंचना सुनिश्चित हो। विद्यार्थियों का भी यह कर्तव्य है कि वे अपने शिक्षकों की बातें ध्यानपूर्वक सुनें और समयबद्ध तरीके से उस कार्य को करें जिससे वे जीवन के हर क्षेत्र में अग्रणी रहें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में छात्रों के सर्वांगीण विकास की जो परिकल्पना की गई है वह तभी साकार होगी, जब हम विद्यार्थियों के व्यावसायिक कौशल के साथ-साथ क्रियात्मक कौशल का भी विकास कर सकें। भारत अभी आजादी का अमृत महोत्सव बना रहा है और हमारे प्रधानमंत्री का सपना है कि हम विकासशील से विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जाएं। भारत जब अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे कर रहा होगा उस समय भारत विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आगे होगा। आज भारत विभिन्न क्षेत्रों में विश्व पटल पर छाया हुआ है, चाहे वह दक्षिणी क्षेत्र पर उतरने वाला पहला देश हो या आदित्य  L -1 को स्थापित करने वाला। आज के दिन हम शपथ लें कि हम संविधान के मूल कर्तव्यों  की अनुपालन सच्चे मन से करें यही देश को आजाद कराने के लिए प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सहित उन सभी महान विभूतियों के प्रति, जिन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की,  हमारा सच्चा नमन होगा।" 

निष्कर्ष रूप में मुख्य अतिथि ने भारत की आज़ादी में भाग लेने वाली महान विभूतियों और भारतीय संविधान के निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाने वाले बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर एवं अन्य सभी गणमान्यों के प्रति अपना आदर प्रकट किया। राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ ही उन्होंने विद्यार्थियों को अपने जीवन में नैतिक मूल्यों के साथ शिक्षा प्राप्त करने पर बल दिया।

कार्यक्रम के अंत में माननीय मुख्य अतिथि द्वारा छात्र-छात्राओं के बीच मिष्ठान वितरण भी किया गया।

शब्दशिल्प की पहल पर तैयार

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...