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उलझन - समाज में प्रगतिशील लोग अपने-अपने प्रयासों से समाज को उत्साहित करने को प्रयत्नशील हैं, लेकिन क्या कारण है कि उदासीनता है कि जाती ही नहीं?

 


सुलझन 

दुनिया को लेकर हर व्यक्ति की अपनी धारणा है। समय के साथ व्यक्ति स्वयं में भी बदलाव लाता है और चाहता है कि उसके आस-पास के समाज में भी बदलाव आए। कल जो बातें विचार के स्तर पर थीं, वे आज साकार होकर व्यवहार में आ गई हैं और आज हम जो विचार कर रहे हैं, उनमें से बहुत-सी बातें कल हमें धरातल पर दिखाई देंगीं। इसलिए समाज को सही दिशा में आगे बढ़ाने के लिए प्रगतिशील लोगों की सक्रिय भूमिका की आवश्यकता है। परिवेश निरंतर परिवर्तनशील है। ये परिवर्तन सभी के लिए शुभ हों, मंगलकारी हों, ऐसी कामना करने वाले लोग प्रगतिशील कहलाते हैं। प्रगतिशील लोग अगर इस बात पर विचार कर रहे हैं कि जनता की उदासीनता दूर हो, तो दुनिया के बेहतर होने की संभावना अभी बनी हुई है।

वैसे तो ईश्वर ने सभी को एकल इकाई को रूप में भेजा है और किसी को दूसरे की ज़िम्मेदारी नहीं दी है। लेकिन मनुष्य ने समाज का जो ढाँचा बनाया है, उसमें शीर्ष पर बैठे, अनुभवी और प्रगतिशील लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे लोगों को सही रास्ते पर लाने का प्रयास करें ताकि समाज की यह व्यवस्था कायम रहे। यह धारणा काफ़ी हद तक सही है कि समाज में जड़ता और उदासीनता है। समाज की संवेदनशीलता का स्तर बढ़ाने के लिए प्रगतिशील लोग जो प्रयास कर रहे हैं, उससे वांछित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।

व्यक्ति अपने आस-पास जो देखता है, उसके आधार पर तय करता है कि उसे कैसा व्यवहार करना है और क्या बनना है। अगर हम देखते हैं कि लोग टैक्स चोरी करके, कालाबाज़ारी करके धनवान बन रहे हैं। लोग भव्य मकानों में रह रहे हैं और महंगी गाड़ियों में घूम रहे हैं। सत्ता और प्रशासन में उनकी अच्छी जान-पहचान है। ऐसे लोगों का कोई काम नहीं रुकता। लोग बड़े-बड़े धार्मिक और सामाजिक आयोजन करवा रहे हैं, सभी उन्हें सलाम कर रहे हैं तो कौन होगा जो ऐसा नहीं बनना चाहेगा। सादा जीवन उच्च विचार कोई क्यों अपनाएगा। अगर प्रगतिशील लोग चाहते हैं कि जनता ईमानदारी, संयम, सादगी और परस्पर मैत्री भाव की ओर आकर्षित हों तो उन्हें एक बड़ा चुंबक बनना पड़ेगा। सच्चाई की राह पर चलने वाले की मदद करनी पड़ेगी, उसे उचित मान -सम्मान देना होगा और गलत राह पर चलने वालों के प्रति असम्मान व्यक्त करना होगा, तभी कुछ और लोग इस राह पर चलने के लिए आकर्षित होंगे।

न्यूटन का पहला नियम है कि यदि कोई वस्तु स्थिर है तो स्थिर रहेगी और गतिशील है तो गतिशील रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाहरी बल कार्यरत न हो। इसे जड़ता का नियम कहते हैं। भौतिकी का यह नियम बदलाव के लिए बाहरी बल की वकालत करता है जबकि व्यक्ति में बदलाव के लिए आंतरिक बल की आवश्यकता होती है। जब व्यक्ति भीतर से ठान लेता है कि मुझे बदलना ही है और इसके लिए मैं कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हूँ, तभी वह बदल पाता है। बाहरी विचारों से वह प्रभावित तो होता है लेकिन भीतरी जड़ता उसे यथास्थिति में ही रखती है, उसे बदलने नहीं देती। प्रगतिशील लोग अन्य लोगों को भीतरी बदलाव के लिए प्रेरित कर सकते हैं। हरेक का जड़ता का स्तर अलग-अलग होता है। हो सकता है कुछ लोग स्वयं को जल्दी बदल दें जबकि कुछ लोगों को बदलाव स्वीकार करने में अधिक समय समय लग सकता है। पानी की धार से भी पत्थरों के आकार बदलते हैं, बस इसके लिए निरंतरता और धैर्य चाहिए।

यह समाज बहुत बड़ा है और समाज के क्रियाकलापों के अनेकानेक पक्ष हैं। प्रगतिशील लोग, जो संख्या में बहुत कम हैं, इतने बड़े समाज के हर पक्ष में बदलाव नहीं ला सकते। यदि हम कुछ सफल प्रगतिशील लोगों के जीवन पर विचार करेंगे तो पाएँगे कि वे मुख्यतः किसी एक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करके उसी पर कार्य करते हैं। कोई पानी बचाने पर कार्य कर रहा है, कोई बाल शोषण रोकने पर, कोई प्लास्टिक का उपयोग कम करने पर, कोई शारीरिक स्वास्थ्य पर तो कोई मानसिक स्वास्थ्य पर। एक साथ सभी विषयों पर कार्य नहीं किया जा सकता, यह अन्य प्रगतिशील लोगों को भी स्वीकार करना होगा।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने बड़े अध्यात्म केंद्र खोले हैं। वे योग सीखा रहे हैं, दवाएँ बेच रहे हैं, घर-परिवार के लिए सलाह दे रहे हैं, पर्यावरण पर चर्चाएँ कर रहे हैं और राजनीति व अर्थव्यवस्था की बातें भी कर रहे हैं। क्या वाकई वे बड़े स्तर पर सकारात्मक बदलाव ला पाए हैं और समाज की उदासीनता दूर कर पाए हैं, या वे अपने विस्तार पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं, यह विचार की आवश्यकता है। इसी तरह आपको सोशल मीडिया पर भी प्रेरणादायी बातें करने करने वाले मिल जाएँगे। उनका भी मुख्य उद्देश्य अपने श्रोतावर्ग का और अपने व्यापार का विस्तार करना होता है। ऐसे लोग व्यक्ति के भीतर की जड़ता तोड़ पाएँगे, इसमें मुझे संदेह है।

बदलाव धीरे-धीरे होते हैं। प्रगतिशील लोगों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और एकदूसरे का उत्साहवर्धन करते रहना चाहिए। अगर वे एक बार में एक गतिविधि पर ध्यान केंद्रित करें और छोटे-छोटे लक्ष्य तय करके आगे बढ़ें तो सफलता की दर अधिक रहेगी। उन्हें अपनी कार्यनीति की भी निरंतर समीक्षा करनी चाहिए कि जड़ता दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है और किस प्रकार वे समाज में अधिक स्वीकार्य हो सकते हैं। अच्छा कार्य करने वालों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि अन्य लोग भी अच्छे कार्यों की ओर आकर्षित हों। इस बात में विश्वास करना चाहिए कि समाज की उदासीनता एक दिन में दूर नहीं होगी, लेकिन एक दिन ज़रूर होगी।

यशवंत जी द्वारा ट्रेंडसेटर फीचर्स के आग्रह पर रचित


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