मैं जैसा हूँ वैसा तो जग में नहीं कभी भी दिख पाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।
जग वाले केवल देख रहे हैं चेहरा मेरा मुस्काता।
है भरा हुआ अमृत या विष हृदय का नहीं नज़र आता।
मेरी कोमलता के पीछे हैं कितने ही पाषाण छिपे।
कुछ बुझे हुए जहरों तक से मेरे हृदय में घाव हुए।
बस मुस्कानों से बिखरा ही मोहक-सा उपवन दिख पाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।।१।।
मैं दूषित भावों को लेकर अंतर में सदा उलझता हूँ।
मैं खुद में ऐसा उलझा हूं जो दिखता नहीं सुलझता हूँ।
मेरे कटु वचन मुख से निकले हो सकता है हितकारी हों।
जो बोल रहा मीठा-मीठा हो सकता मिथ्याचारी हो।
यह मात्र दिखावा है मेरा जिसमें हर कोई घिर जाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।।२।।
मैं भला चाहता औरों का इसमें भी खुद को छलता हूँ।
मैं देख दूसरे के सुख को अपने हाथों को मलता हूँ।
कभी कभी तो ईश्वर तक भी देख मुझे झुंझलाया है।
जिस ध्येय से उसने मुझे रचा उसको ही मैंने धुंधलाया।
मैं देख-देख करतब अपने दिख जाता हूं धिक-धिक गाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाया।।३।।
मैं माला हाथों में लेकर ईश्वर को भी धोखा देता।
मन जग में दौड़ लगाकर के कुभावों को मौका देता।
मैं निज नयनों की भाषा भी अब तक नहीं समझ पाया।
किसके प्रति मैली दृष्टि कहाँ लोलुपता को दर्शाया।
है घुटन एक मैं जैसा है वैसा ही क्यूँ नहीं दिख पाता?
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।।४।।
छल, दम्भ, द्वेष, पाखंडों से ये दुनिया भरी हुई सारी।
मैंने भी जीवन भर इनसे ही खूब निभाई है यारी।
पर दुनिया को मैं इन दोषों से खुद को दूर बताता हूँ।
गुण भरे मेरे में संस्कारी मैं जग में टेर लगाता हूँ।
मैं भले न जग से कह पाऊँ पर इनसे नहीं मुक्ति पाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।।५।।
मैं जैसा हूँ गर वैसा ही इस जग के सम्मुख आ जाऊं।
तो अटल सत्य यह जोवन का मैं चरम-चरम ही सुख पाऊं।
मैं ईश्वर से विनती करता जैसा हूँ वैसा रहने दो।
फिर भले कष्ट कितना ही हो उसको हे प्रभु सहने दो।
हर दुविधा को हर लो जिससे जिंदगानी में ठिठका पाता।
जो छवि बनी मेरी उस पर मैं कहाँ कभी भी टिक पाता।।६।।
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