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उलझन - पर्यावरण के शोधन को लेकर पराली पर आरोप लगते रहे हैं, तो क्या पराली को ही समग्र प्रकार के पर्यावरणीय प्रदूषण के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना उचित मान लिया जाए।

सुलझन

दीपावली के आस-पास दिल्ली में अचानक प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगता है। हवाएँ कम चलती हैं और सरदी का मौसम शुरू होने से कोहरा और धुआँ मिलकर लोगों का जीना दूभर कर देते हैं। लगभग उसी समय दिल्ली के आस-पास के राज्यों में धान की कटाई के बाद गेहूँ की बुवाई का मौसम होता है और पराली जलाकर खेत को गेहूँ की फसल के लिए तैयार किया जाता है।

हाल ही में आईआईटी कानपुर ने दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण का स्तर कम करने के दस उपाय सुझाए हैं। ये उपाय हैं: 

1. होटलों और रेस्तरां में कोयले वाले तंदूर के उपयोग पर रोक लगे।

2. अधिक से अधिक लोग एलपीजी का उपयोग करें। 

3. म्यूनिसिपैलिटी द्वारा एकत्रित कचरे को जलाया न जाए। 

4. भवन-निर्माण और भवन-ध्वस्त करते समय साइट को कपड़े से ढका जाए ताकि धूल-कण न फैलें। 

5. कंक्रीट तैयार करते समय आधुनिक तकनीक का उपयोग हो ताकि उस प्रक्रिया में धूल न उड़े। 

6. इलेक्ट्रिक व बीएस-VI मानक वाले वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। 

7. पावर प्लांट्स में आवश्यक व्यवस्थाएँ की जाएँ ताकि वहाँ से सल्फर डाइ ऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन कम से कम हो। 

8. पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल वाष्पीकरण पर नियंत्रण के उपाय करना क्योंकि वाहन में पेट्रोल भरते समय पेट्रोल कणों के हवा में घुलने से भी प्रदूषण होता है। 

9. पराली के अन्य उपयोगों के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना ताकि किसान पराली न जलाएँ। 

10. राख-कणों (fly ash) में कमी लाने के उपाय करना। इसे नियंत्रित करने के उपायों में पेड़ लगाना भी शामिल है।

अगर ऊपर के दस उपाय देखें तो उनमें से केवल एक पराली से संबंधित है। शहरी आबादी की यह धारणा है कि वे जो कुछ कर रहे हैं, जैसे मकान बनवाना, वाहन चलाना, तंदूर पर खाना बनाना, प्लास्टिक का उपयोग आदि सभी अत्यावश्यक कार्य हैं लेकिन पराली जलाना एक अनावश्यक और अवांछित गतिविधि है जिससे उनका जीना और भी दूभर हो जाता है। इस धारणा से बाहर निकलने की आवश्यकता है। यह जानना ज़रूरी है कि किसान यदि खेती नहीं करेंगे तो शहरी आबादी अपना पेट कैसे भरेगी।

पराली के कुछ तकनीकी पक्ष हैं, जैसे- मशीन से धान की कटाई। धान के खेत में जब हार्वेस्टर चलते हैं तो वे फसल का ऊपरी हिस्सा काट कर एकत्रित कर लेते हैं और पौधे का शेष हिस्सा खेत में ही रह जाता है। यही बचा हुआ हिस्सा पराली है। धान की फसल लेने के बाद किसान को अब अपने खेत में रबी की फसल (मुख्यतः गेहूँ) की बुवाई करनी है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते अब फरवरी माह में ही गरमी पड़ने लगी है, इसलिए किसानों को गेहूँ की बुवाई में एक-एक दिन की देरी भारी पड़ती है। धान की फसल लेते ही उन्हें गेहूँ की फसल के लिए खेत तैयार करना है। पराली हटाने के लिए उनके पास अधिक समय नहीं होता। तेज़ी से पराली से मुक्ति के लिए पराली को जला देना उन्हें सबसे आसान और त्वरित तरीका लगता है।

फसल के बचे हुए हिस्से यानी पराली को खेत से निकालने के अब अनेक यंत्र भी मौजूद हैं। कई बड़ी मशीनें हैं जो खेत में से पराली निकाल सकती हैं। इन मशीनों का व्यावहारिक पक्ष यह है कि किसान अपने से ये मशीनें खरीदें तो उन्हें बहुत महंगी पड़ेंगी। वर्ष में केवल 3-4 दिन उपयोग में आने वाली मशीनों की सार-संभाल भी कठिन हो जाती है। कई किसान ये मशीनें किराये पर भी लेते हैं, लेकिन समस्या यह है कि सभी किसानों को एक साथ इन मशीनों की ज़रूरत पड़ती है। एक साथ इतनी सारी मशीनें उपलब्ध कराना, चाहे उनका किराया मिल रहा हो, किसी भी बाज़ार के लिए कठिन है। अगर किसी किसान को उस मशीन के लिए सात दिन इंतज़ार करना पड़े तो उसका फसल चक्र गड़बड़ा जाएगा। गेहूँ की बुवाई में देरी होने पर गेहूँ की फसल गरमियों को झेल नहीं पाएगी और उपज की गुणवत्ता खराब हो जाएगी।

किसानों की समस्या को समझे बगैर यदि हम उन्हें समाधान दें तो वे समाधान कारगर नहीं होंगे। उन्हें पराली से मुक्ति का शीघ्र समाधान चाहिए। पराली का कई तरह से उपयोग किया जा सकता है लेकिन उन्हें पराली से अधिक अगली फसल की चिंता है। पराली हटाने के उपकरण सरकार को उपलब्ध कराने होंगे और समय पर उपलब्ध कराने होंगे। किसान इतना खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं। प्रदूषण की वजह से सभी के खर्च बढ़ जाते हैं। सरकार और जनता, दोनों को स्वास्थ्य पर और अन्य व्यवस्थाओं पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। इसका एक छोटा हिस्सा पराली हटाने की मशीनों पर लगाया जाए तो पराली की समस्या का समाधान हो जाएगा।

प्रदूषण या पर्यावरण से निपटने का एक कारगर उपाय उपभोग कम करना है। हमारे उपभोग जितने कम होंगे, पर्यावरण पर बोझ कम पड़ेगा और प्रदूषण भी कम होगा। कोरोना लॉकडाउन के समय हमारे उपभोग कम होने पर प्रदूषण बहुत हद तक कम हो गया था और नदियाँ भी स्वच्छ हो गई थीं। अगर वाहनों और कारखानों से निकलने वाले धुएँ तथा भवन निर्माण से उड़ने वाली धूल के माध्यम से हम 'प्रगति' देखना चाहते हैं तो यह विकास हमें प्रदूषित वातावरण की ओर ही ले जाएगा। प्रदूषण का कारण एकमात्र पराली को बता देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। सभी स्तरों पर प्रयास की आवश्यकता है और 'प्रगति'  क्या है, इस पर नए सिरे से विचार करने की भी आवश्यकता है।

यशवंत

(ट्रेंडसेटर फीचर्स के लिए)

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