दो दया का दान भगवन मैं तुम्हारी हूँ शरण।
मेरे सारे दुर्गुणों का प्रभु अब कर लो हरण।
जग के माया जाल में ही मैं रहा अब तक घिरा।
काम क्रोधी कूप में ही मैं रहा अब तक गिरा।
नाथ फिर भी हूँ तुम्हारा जैसा हूँ कर लो वरण।
मेरे सारे दुर्गुणों का प्रभु अब कर लो हरण।।१।।
है तुम्हारा ही दिया तो चंचला मेरा ये मन।
इसलिए ही कर न पाया बैठकर अब तक भजन।
है तुम्हारे हाथ में ही ये मेरा जीवन मरण।
मेरे सारे दुर्गुणों का प्रभु अब कर लो हरण।।२।।
जो तुम्हें भजता है भगवन स्वयं वो तर जाएगा।
पर बताओ मूढ़ मुझसा कैसे मुक्ति पायेगा।
हूँ दया का पात्र मेरा अब अधिक न हो शरण।
मेरे सारे दुर्गुणों का प्रभु अब कर लो हरण।।३।।
तुम दया के सिन्धु भगवन दया घन बन बरसती।
मैं ही क्या दुनिया ही सारी इस दया को तरसती।
मुझको अपना लो तुम्हारे मेरे उर बसते चरण ।
मेरे सारे दुर्गुणों का प्रभु अब कर लो हरण।।४।।
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