सृष्टि की रचना के संग ही ईश्वर ने संविधान बनाया।
कैसे रहना है दुनिया में मानव को यह ज्ञान सिखाया?
वो जग रचता, पालन करता और वही संहार रहा कर।
जो करते हैं कर्म धर्म के उनको ही यह प्यार रहा कर।
जो विधान के उलट कर्म हैं अधर्म वही जग में कहलाए।
सभी दुखों का मूल अधर्म है जो करते वो ही पछताये।
रोग, वियोग व अपयश आदि मात्र अधर्मों से है आया। कैसे रहना है दुनिया में मानव को यह ज्ञान सिखाया!!१!!
कहा विधान में सच ही बोलो सदा झूठ से दूरी रखना।
मात-पिता व गुरुजनों की नित ही मन से सेवा करना।
प्रेम सभी जीवों से करना सदा प्रकृति का मान बढ़ाना?
दूर सदा हिंसा से रहना मात्र अहिंसा को अपनाना।
दुष्ट जनों के निकट न जाना प्रेम सुधि जन से बतलाया।
कैसे रहना है दुनिया में मानव को यह ज्ञान सिखाया!!२!!
सात्विक हो आहार सदा ही भाव श्रेष्ठ ही होवें मन में।
अहं भाव न पनपे मन में मानवता हो अंतर्मन में।
मनमानी जीवन जीने पर विधना ने प्रतिबन्ध लगाया।
जो चलते विपरीत विधि के नेत्र होत भी अन्ध बताया।
संतजनों सम जीवन उसका जो विधि सम्मत चलता पाया।
कैसे रहना है दुनिया में मानव को यह ज्ञान सिखाया!!३!!
सही नियम के पालन से ही उर में शक्ति संचित होगी।
मानव योनि जग में आकर मुक्ति से न वंचित होगी।
सत्य सनातन धर्म हमारा जीने की एक कला सिखाता।
सुखी उसी का जीवन जग में जो विधान संग चल दिखलाता।
सत्कर्मों की राह है निर्मल चला जो जीवन सफल बनाया।
कैसे रहना है दुनिया में मानव को यह ज्ञान सिखाया!!४!!
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
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