उलझन: कहीं कुछ शैक्षणिक बदलाव हम स्वमेव ही ऐसे तो नहीं कर रहे जो गलत या असंगत होने के बावजूद प्रचलन में आते जा रहे हैं और गलत परंपरा के वाहक बन रहे हैं।
सुलझन
कुछ समय पहले मैंने एक अन्य संदर्भ में लिखा था कि अस्पताल और डॉक्टर बढ़े हैं लेकिन बीमारियाँ और मरीज़ उसकी तुलना में कहीं ज़्यादा बढ़े हैं। स्कूल और बीएड डिग्रीधारी बढ़े हैं लेकिन शिक्षा का स्तर तो गिरता गया है। कल्याणकारी योजनाओं की संख्या बढ़ी है लेकिन अमीर-गरीब के मध्य खाई तो और गहरी हुई है। धर्मस्थल और आराधक बढ़ते जा रहे हैं, साथ में हम अधर्म और अनैतिकता को स्वीकारते जा रहे हैं। आज, हर तरफ शुभकामनाओं की भरमार है, लेकिन आत्मीयता न हो तो यह औपचारिकता बेकार है। लोग पर्यावरण पर तो चिंता जता रहे हैं लेकिन जंगल निरंतर घटते जा रहे हैं।
यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हमने अपने आस-पास की समस्याओं पर बात बहुत की है लेकिन हम समाधान की ओर नहीं बढ़ पा रहे हैं। हमारी स्थिति उस चिकित्सक जैसी है जिसने रोग की पहचान तो ठीक की है लेकिन इलाज बताते समय रोगी का हित सर्वोपरि नहीं रखा बल्कि न जाने क्यों अस्पताल और दवा कंपनियों के हितों का अधिक खयाल रखा है। परिणाम यह हो रहा है कि रोगी ठीक नहीं हो रहा और उसकी समस्या के समाधान का दावा करने वाले मालामाल होते जा रहे हैं। शिक्षा प्रणाली में किए जा रहे किसी भी बदलाव या सुझाए गए समाधान पर विचार करते समय हमें देखना होगा कि उससे समस्या का सही समाधान हो रहा है या नहीं तथा कौन-कौन ऐसे निर्णयों से अधिक लाभान्वित हो रहे हैं।
शिक्षा हमारी क्या सभी मानवीय गतिविधियों का आधार है। हम जो शिक्षा हासिल करते हैं, उसके माध्यम से ही दुनिया की एक समझ बना पाते हैं और अपनी तथा दुनिया की समस्याओं का समाधान करते हुए इस दुनिया को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। ऐसे प्रयासों की गूंज दूर क्या बहुत दूर तक जाती है। इसलिए शिक्षा प्रणाली पर सर्वाधिक विचार किए जाने की आवश्यकता है। क्षेत्र चाहे चिकित्सा हो या कानून-व्यवस्था, सभी का आधार आखिरकार शिक्षा ही है। नई शिक्षा नीति में अच्छा या बुरा क्या है, यह निर्णय किसी पर थोपने की जगह मैं यहाँ कुछ मानदंडों पर चर्चा करना चाहूँगा जिनके माध्यम से हम वर्तमान शिक्षा का और इस क्षेत्र में किए जा रहे परिवर्तनों का आकलन कर सकें।
शिक्षा के प्रसार से हमारी अपेक्षा है कि शिक्षित व्यक्ति किसी पर बोझ न बने, कानून-व्यवस्था का पालन करे और इस दुनिया को और बेहतर बनाने में मदद करे और उसके लिए प्रयास करे। शिक्षित व्यक्ति मेहनत से कतई भी न घबराए और लक्ष्य हासिल करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। इसके अलावा, व्यक्ति का धैर्यवान बनना भी आवश्यक है ताकि वह हार भी स्वीकार कर सके और कठिन समय में टूटे भी नहीं। हम वर्तमान परिवर्तनों को इन मानदंडों पर परख सकते हैं कि इन परिवर्तनों से ये अपेक्षाएँ पूरी हो रही हैं या कि नहीं।
सबसे पहले तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी शिक्षा प्रणाली में कुछ अच्छाइयाँ रही हैं जिनकी वजह से हम भारतीय दुनिया भर के जॉब मार्केट पर छाए हुए हैं। अमेरिका, यूरोप, मध्य एशिया आदि प्रमुख कारोबारी क्षेत्रों में भारतीयों की ज़बरदस्त मांग है। कई बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ भारतीय हैं। इसके अलावा, हर स्तर पर भारतीय कार्य कर रहे हैं और कई भारतीय भारत में रहते हुए भी विदेशी कंपनियों के लिए कार्य कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि स्वतंत्रता के बाद लागू की गई शिक्षा प्रणाली में व्यक्ति को इतना सक्षम बनाने की क्षमता तो है कि वे रोज़गार हासिल कर सकें।
अब हम यह विचार करते हैं कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मुख्य कमियाँ या समस्याएँ क्या-क्या हैं। शिक्षा का महंगा होना, विद्यालयों में शिक्षकों का और बुनियादी सुविधाओं का अभाव, रटने पर अधिक ज़ोर देना, मेडिकल-इंजीनियरिंग आदि के श्रेष्ठ संस्थानों में प्रवेश के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा, श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए विद्यार्थियों व अभिभावकों पर दबाव, सह-शैक्षणिक गतिविधियों पर अधिक बल न देना, शिक्षा के लिए समर्पित शिक्षकों की भारी कमी आदि प्रमुख समस्याएँ हैं। जब तक शिक्षा वाजिब कीमत पर उपलब्ध न होगी, विद्यालयों में पर्याप्त व समर्पित शिक्षक न होंगे, अलग-अलग क्षेत्र की नौकरियों के वेतन में ज़मीन-आसमान का अंतर बना रहेगा और पैसा कमाना ही एकमात्र सफलता माना जाएगा, तब तक केवल विषय चुनने में छूट देने से और अंकों के स्थान पर ग्रेड प्रणाली लाने से लाभ नहीं होगा। नुकसान हो जाए, इसकी पूरी आशंका है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक सेवा आदि की परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा कम होती नहीं दिखती। हमें उस दबाव को झेलने के लिए विद्यार्थियों को तैयार करना है या उन परीक्षाओं को कम प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश करनी है, यह प्रश्न भी हमारे नीति-निर्माताओं से मंथन की अपेक्षा रखता है।
शिक्षा में एक कमी यह बताई जाती है कि यह उद्यमी तैयार नहीं करती। दरअसल, देश में जिस प्रकार की कानूनी जटिलताएँ हैं और प्रशासन-व्यवस्था है, उसमें किसी भी व्यक्ति के लिए व्यापार शुरू करना आसान नहीं है। अगर कमी हमारी शिक्षा प्रणाली की होती तो विदेशों में पढ़े लोग यहाँ आकर कारोबार खोल सकते थे। लेकिन इसका विपरीत हो रहा है। हमारे लोग विदेश जाकर कारोबार कर रहे हैं।
एक जर्मन शब्द है- Verschlimmbesserung. इसका अर्थ है- सुधार के वे प्रयास जिनकी वजह से स्थितियाँ बदतर हो जाती हों। हमें इस प्रकार के परिवर्तनों से बचना चाहिए जिनसे हमारी वर्तमान समस्याओं का समाधान न होता हो। हमारी शिक्षा ऐसी हो कि हम न केवल अपने पैरों पर खड़े हों बल्कि ऐसे मनुष्य बनें कि यह दुनिया अन्य जीवों, वनस्पतियों आदि के लिए भी एक बेहतर दुनिया बने। प्राचीन समय में भारतीयों ने शिक्षा के क्षेत्र में इतनी उन्नति कर ली थी कि वे चाहते तो अपनी संख्या बेहिसाब बढ़ा सकते थे और विलासिता के समस्त साधन अपना सकते थे। लेकिन उस शिक्षा में प्रकृति के साथ सामंजस्य था। हमने अन्य जीवों का जीवन खतरे में नहीं डाला, हमने इतने भवन नहीं बनाए कि पहाड़ और पेड़ समाप्त हो जाएँ। हमने वातावरण में ज़हर नहीं फैलाया। हमारा आदर्श पुनः ऐसी ही शिक्षा होनी चाहिए जो इस पृथ्वी पर दीर्घकाल तक जीवन सुनिश्चित करे। हमें शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे हर परिवर्तन को इस कसौटी पर परख कर देखना चाहिए कि उससे समस्त संसार को लाभ होगा या केवल कुछ लोगों की जेब भरती जाएगी।
यशवंत
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