संस्कार मानव को जग में पावन जीवन सीख सिखाते।
जीने की एक कला मनोहर संस्कार ही हैं बतलाते।।
जो सीखा बचपन में हमने वो बनता आधार जिंदगी।
मात्र उसी में भरा हुआ है नफरत अथवा प्यार जिंदगी।
बालेपन से ही जीने का सूत्र मनोहर हमने पाया।
क्रोध सदा धीरज खोता है राह पतन की है बतलाया।
क्रोध यदि करना पड़ जाये सिद्ध पुरुष संयम अपनाते।
जीने की एक कला मनोहर संस्कार ही हैं बतलाते।।१।।
पावन सीख यही जीवन की अहंकार नहीं हो जीवन में।
द्वेष भावना और वासना कभी नहीं हो अंतर्मन में।
राग ईर्ष्या ऐसा जिससे तन-मन निशिदिन ही जलता है।
सफल वही जीवन है जिसमें करुणा और प्रेम पलता है।
बिना विनम्रता के जीवन में भक्ति भाव नहीं आ पाते।
जीने की एक कला मनोहर संस्कार ही हैं बतलाते।।२।।
सत्य का मार्ग बड़ा उज्ज्वल है मगर भरा कांटों से पाता।
फिर भी झूठ फरेबी से तो बचा सत्य ही है ले जाता।
दया भाव नहीं जिस मानव में वो मानव मानव नहीं होता।
सच पूछो तो पत्थर है वो अन्त समय निश्चित ही रोता।
बिन लालच के दान पुण्य सब उत्तम श्रेणी में ही आते।
जीने की एक कला मनोहर संस्कार ही हैं बतलाते।।३।।
जो अग्रज अपने होते हैं सदा सीख अच्छी देते हैं।
सीख वही पा ज्ञानी जन तो नैया जीवन की खेते हैं।
काम क्रोध मद लोभ मोह तो जीवन की पावनता खोते।
इनमें पड़कर ही तो मानव नहीं चैन से जग में सोते।
दूर रहें जो इन दोषों से ईश्वर उनको गले लगाते।
जीने की एक कला मनोहर संस्कार ही हैं बतलाते।।४।।
कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण
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