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समझें तो है निदान

'समझें तो है निदान', ऐसा क्यों कहा या लिखा गया। आइए जरा समझते हैं इसको। 

एक गांव के दो कृषक सर्दी की रात में खेत पर पानी पर थे। सर्दी अधिक थी तो उन्होंने अलाव जला ली अलाव जलाते ही घुंघरू की आवाज हुई। उनको आवाज सुन घबराहट हुई। हिम्मत कर दोनों डटे रहे। बिलकुल ऐसे ही अगले वार पर हुआ तो दोनों डर गए प्रेतात्माओं का ध्यान करके। इसमें खास यह था कि आवाज अलाव जलाने के साथ ही होती थी। दोनों ने हिम्मत की कि आज इसकी वास्तविकता को जानेंगे जरूर। अलाव जलाया, आवाज़ हुई, सवेरा हुआ तो प्रयास किया जानने का। जानकारी में आया कि जिधर से आवाज आती थी वहां एक कबूतर बैठा हुआ था जिसके गले में घुंघरू पड़ा हुआ था और अलाव जलते ही उत्पन्न प्रकाश और ऊष्मा से कबूतर के हरकत करने से आवाज उत्पन्न होती थी। भ्रांति का निवारण होने और सत्य जान दोनों ने राहत की सांस ली और खुशी खुशी घर को चले गए।

निष्कर्ष - भ्रम से बाहर आने के लिए हर संभव प्रयास करें।

'अंधविश्वास हों निर्मूल तो ज्ञान से' - डॉ. महिपाल; "अंधविश्वासों पर नहीं वास्तविकता पर विश्वास करें" - डॉक्टर महिपाल

यह एक सच्ची घटना है, जिसका विवरण भुक्तभोगी ने जनपद सहारनपुर के सढौली हरिया निवासी लेखक चौ. महिपाल को उनके बहादरपुर स्थित फार्म पर दिया। इससे बिलकुल स्पष्ट होता है कि अंधविश्वासों पर नहीं वास्तविकता पर विश्वास करें। और! कल्पना ही नहीं आंखों से देखी ही वास्तविकता है।

जेठ का महीना था। लेखक के नामराशि चौ. महिपाल सिंह व उनका जिला पानीपत बघोली निवासी एक रिश्तेदार रात को दस बजे रठान आए, जो उनके घर से लगभग दो किलोमीटर दूर था। मकसद था खेतों को पानी देना। यह घटना वर्ष 2000 की है। उस समय सरकारी नलकूपों पर ऑपरेटर नहीं हुआ करते थे। स्वयं ही नलकूप को सिंचाई हेतु ऑपरेट करना होता था। चौ० महिपाल सिंह के रठाण पर एक आम का पेड़ था। वे अपने रिश्तेदार के साथ खेत पर पहुंचे और पेड़ के नीचे चारपाई पर बैठे तो उन्हें घुंघरू बजने की आवाज़ पेड़ के ऊपर वाले भाग से आई। दोनों ने भयभीत होकर सोचा कि पेड़ पर कोई भूत है। संयोग यह था कि उसी दिन चमेला नाम के अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार निकट ही उसके पट्टे के खेत में किया गया था। इसका ध्यान आते ही उनको यकीन हो गया कि चमेला भूत बनकर पेड़ पर बैठ गया है। महीपाल सिंह व उनका रिश्तेदार विचार करने लगे कि यह तो गड़बड़ हो गयी और चलकर गाँव वालों को बुलाकर लाते हैं।

और उन्हें दिखाते हैं कि चमेला का भूत पेड़ पर है। महिपाल के रिश्तेदार ने कहा कि चलो गांव भाग चलते हैं। महिपाल ने कहा कि नहीं, हम दोनों साथ हैं। भूत को देखते हैं। रात के दस तो बज ही गए हैं। इन दिनों चार या साढ़े चार बजे दिन निकल आता है। छह घंटे की तो बात है। इस समय को जागकर काटते हैं। तब महिपाल के रिश्तेदार ने उनको एक आइडिया दिया कि भूत आग से भाग जाते हैं। इसलिए आग जलाते हैं जिससे कि भूत भाग जाए।

दोनों ने आग जलाई। तब आग के जलने और बुझने पर मजेदार तथ्य सामने आए। जब आग जलती थी तो घुंघरू बजते थे और आज जलनी बंद होते ही घुंघरुओं की ध्वनि बंद हो जाती। अब आग जलते हो दोनों टकटकी लगाकर पेड़ पर चमेले के काल्पनिक भूत की ओर देखने लगते। आग के जलने पर घुंघरू बजने और बुझने पर घुंघरू ना बजने की पूरी प्रक्रिया सारी रात चलती रही। महिपाल और उनके रिश्तेदार ने निर्णय ले लिया था कि रोशनी में भूत को अवश्य ही देखना है।

सवेरे के चार बजे और प्रतीक्षा की घड़ियां खत्म हुईं। जाँचा परखा तो जो तथ्य सामने आए उनसे स्थिति 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया' वाली बनी। दिन का प्रकाश होने पर उन्होंने देखा कि पेड़ की एक साख पर एक कबूतर बैठा हुआ है और उसके गले में कुछ पहनाया हुआ है।

महीपाल सिंह व उनके रिश्तेदार ने कबूतर को पेड़ से उड़ा दिया। कबूतर के गले में कुछ था, अतः वह लम्बी उड़ान भर पाने में अक्षम था। वे दोनों एक चादर के द्वारा कबूतर को पकड़ने के प्रयास करते रहे। यह प्रयास काफी देर चला तथा अन्ततः उन्होंने कबूतर को पकड़ ही लिया। तब उन्होंने पाया कि कबूतर के गले में किसी ने पीतल का भारी घुंघरू बाँध दिया था। यही कारण था कि आग जलने पर कबूतर के हरकत में आने पर घुंघरू बजता था। वहीं बुझने पर वह शाख का सहारा लेकर सो जाता था। इस प्रकार यह वास्तविकता प्रकाश में आई कि पेड़ पर चमेला का भूत नहीं बल्कि कबूतर था।

महिपाल सिंह व उनका रिश्तेदार यदि घुंघरू की आवाज को चमेले का भूत मान लेने तो यह असत्य. एक सत्य बनकर हमेशा के लिए हो जाता और कोई भी उस रास्ते पर जाना बंद कर देता। दूसरा पंडतों के खाने-कमाने का धंधा बन जाता। कहा जाता कि यह करो, वह करो और भूत से बचाव के अनेक उपाय बताए जाने लगते।

इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि वास्तविकता से अवगत होने के बाद ही सब जांच परखकर निर्णय लो।

इस सच्ची घटना का विवरण डॉक्टर महिपाल ने 9 दिसंबर 2023 को नारायण विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में बालकों के समक्ष उनको जागरूक करने व अंधविश्वासों से दूर रखने के ध्येय से प्रस्तुत किया।

इस भाव को हम निम्न कविता के द्वारा और स्पष्टता के साथ समझ सकते हैं -

अनजाना भय

विश्वास गया खो आज मनुष्य का अनजाना भय उसे सताता। 

भ्रमवश होकर, मानव जग में भय को फिरता भूत बताता।


कभी-कभी ऐसा होता है जो दिखता वैसा नहीं होता। 

जब हो जाता ज्ञान सत्य का तब हँसता या नयन भिगोता। 

कांटों में ही छुपा मिला है पुष्प मनोहर लाल गुलाबी। 

पुष्प नहीं कांटे दिखते हैं जब कोई देखे इसे शराबी। 

तम में घिरा मनुष्य जीवन में रस्सी को भी सांप बताता। 

भ्रमवश होकर, मानव जग में भय को फिरता भूत बताता।।१।।


एक बात निश्चित जीवन में जो होना वो होकर रहता। 

फिर भी मानव उस होने को सोच सोच मन में दुख सहता। 

कौन रात ऐसी है जग में दिन नहीं जिसके बाद निकलता। 

फिर मानव रजनी काली में क्यूँ सहता है महा विकलता। 

पता नहीं दिन निकलेगा भी सोच यही मन में घबराता। 

भ्रमवश होकर, मानव जग में भय को फिरता भूत बताता।।२।।


मन में जैसा भाव पलेगा चेहरे पर वैसा झलकेगा। 

भाव उदासी बाहर आकर उसके नयनों से ढलकेगा? 

सदा सफल वो ही होते हैं जो आशा को गले लगाते। 

छोड़ बैठते वो ही मंजिल भाव निराशा जो अपनाते। 

इस भय के चक्कर में फंसकर लक्ष्य भेद नहीं मानव पाता। 

भ्रमवश होकर, मानव जग में भय को फिरता भूत बताता।।३।।


जाल भ्रम का बड़ा गठीला बड़ी कठिनता से कटता है।

इसी जाल में फंसकर मानव रहता सदा हाथ मलता है। 

ईश्वर पर विश्वास संग ही अपने पर विश्वास जरूरी। 

भय से नहीं विश्वास डिगाओ भले दिखे कोई मजबूरी। 

कर्मों के अनुसार सदा ही मानव जीवन में फल पाता। 

भ्रमवश होकर, मानव जग में भय को फिरता भूत बताता।।४।।

कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'



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