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समाज ही हमें पूर्ण बनाता है।

सृष्टि के हम सभी नश्वर जीव कितनी असाधारण स्थितियों में जी रहे हैं इसका हमको भान तक नहीं। हममें से हर कोई यहां एक संक्षिप्त यात्रा पर है, बिना यह जाने कि 'किस उद्देश्य से?'। यद्यपि, कभी- कभी उसको अहसास होता है कि वह जानता है, पर यह उसकी कल्पना मात्र हो सकती है। परंतु यदि हम ज्यादा गहराई में न जाते हुए अपने दैनिक जीवन की दृष्टि से ही देखें तो पाएंगे कि हमारा अस्तित्व हमारे सहजीवियों के लिए है, सबसे पहले उनके लिए जिनकी मुस्कान और कल्याण पर हमारी सारी खुशियां निर्भर हैं। फिर उनके लिए, जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, पर जिनकी नियतियों से हम सहानुभूति की डोर से बंधे हुए हैं। दिन में सौ बार मैं स्वयं ही को याद दिलाता हूं कि मेरा आंतरिक और बाह्य जीवन अन्य लोगों पर टिका हुआ है और उसी मात्रा में उन्हें देने के लिए मुझे जी-तोड़ परिश्रम करना चाहिए। जिन आदशों ने मेरी जीवन-यात्रा के दौरान मुझे भीतर से आलोकित किया है और बार-बार हंसी-खुशी जीवन का सामना करने का साहस दिया है, वे हैं सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता। आदमी की जद्दोजहद के साधारण उद्देश्य की संपत्ति, बाहरी सफलता, विलासिता जैसे आकर्षण मुझे हमेशा से तुच्छ प्रतीत हुए हैं। यदि हम अपने जीवन और संघर्ष का पुनरावलोकन करें, तो जल्द ही हमें पता चल जाएगा कि हमारे लगभग सारे कर्म और इच्छाएं अन्य मानवों के होने से जुड़े हुए हैं। हम देखेंगे कि समाज के बिना हम अपने अस्तित्व की कल्पना तक भी नहीं कर सकते। हम वे खाद्य पदार्थ खाते हैं, जो दूसरों ने उपजाए हैं, वे कपड़े पहनते हैं, जो दूसरों ने बनाए हैं, उन घरों में रहते हैं, जो दूसरों ने बनाए हैं। हमारा अधिकांश ज्ञान और मान्यताएं हमें एक ऐसी भाषा में संप्रेषित की गई हैं, जो दूसरों की देन हैं। भाषा के बिना हमारी मानसिक क्षमताएं बहुत ही निचले दर्जे की होतीं, इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि जानवरों के मुकाबले हमारी श्रेष्ठता का श्रेय इस तथ्य को जाता है कि हम सभ्य मानव समाज में रहते हैं।

समाज के लिए एक आदमी का महत्व मुख्यतः इस पर निर्भर है कि किस हद तक उसकी भावनाएं, उसकी सोच और उसके कर्म समाज को भलाई की ओर निर्देशित करते हैं। इस मामले में वह कहां खड़ा है, उस आधार पर हम उसे भला या बुरा कहते हैं। अतः भौतिक, आध्यात्मिक और नैतिक रूप से सभी बहुमूल्य चीजों का श्रेय असंख्य पीढ़ियों में हुए कुछ विशिष्ट रचनात्मक व्यक्तियों को जाता है। एक व्यक्ति ही चिंतन कर सकता और समाज के लिए बहुमूल्य योगदान दे सकता है, यही नहीं, वह नैतिकता के नए मानक स्थापित कर सकता है, जिनके अनुसार पूरा समाज चलने का प्रयास करता है। रचनात्मक, स्वतंत्र सोच वाले विवेकशील व्यक्तियों के बिना समाज का उत्थान उतना ही अकल्पनीय है, जितना समाज की पोषक जमीन के बिना व्यक्तियों का विकास। इस तरह, समाज का स्वास्थ्य उसके अंगभूत व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर उतना ही निर्भर है, जितना उसके राजनीतिक सामंजस्य पर।

('द वर्ल्ड एज आई सी इट' किताब के अनूदित अंश, दैनिक अमर उजाला से साभार, 01.12.2023)

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