कैसे तुमको नाथ रिझाऊँ?
विधि नहीं कोई मैं पाऊँ?
दोषों ने आ मुझको घेरा।
हर पल रहता तेरा मेरा।
कैसे इनसे मुक्ति पाऊँ।
विधि नहीं कोई मैं पाऊँ।।१।।
तुमको निशिदिन मैं भजता हूँ।
पर नहीं मोह-ममता तजता हूँ ।
कैसे इनको छोड़ दिखाऊँ।
विधि नहीं कोई मैं पाऊँ।।२।।
आया शरण तुम्हारी भगवन।
पावन कर दो मेरा तन-मन।
तुमसे इतनी आस लगाऊँ।
विधि नहीं कोई मैं पाऊँ।।३।।
भक्तजनों के तुम्हीं सहारे।
भक्त तुम्हें लगते हैं प्यारे।
करो दया जो भक्त कहाऊँ।
विधि नहीं कोई मैं पाऊँ।।४।।
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