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कविता 'क्षण'

 

क्षण होता है सदा अमोली लेकिन हर कोई नहीं जानता!

जिसने जाना मोल है इसका, ईश दिया उपहार मानता।।


 भूत, भविष्य, वर्तमान भी इस क्षण में ही मिला समाया।

 इस क्षण में कोई रोता देखा और इसी में हँसता पाया।

 अधिक वही मानव रोता है, जिसने क्षण को व्यर्थ गंवाया।

 कभी-कभी क्षण का अवसर खो, मानव जीवन भर पछताया।

 क्षण भर में कोई भावुकता को उर में अपने सदा पालता।

 जिसने जाना मोल है इसका, ईश दिया उपहार मानता।।१।।


 जन्म और मृत्यु इस जग में केवल क्षण भर में होती हैं।

 जन्म क्षणों से खुशियाँ मिलतीं, मृत्यु लख अखियाँ रोती हैं।

 क्षण घड़ियां ही धीर बंधातीं क्षण घड़ियां धीरज खोती हैं।

 क्षण घड़ियां ही प्रेरक बनकर प्रदर्शक पथ की होती हैं।

 क्षण वह ही उत्तम होता है, धर्म कर्म जो राह थामता।

 जिसने जाना मोल है इसका, ईश दिया उपहार मानता।।२।।


 कभी-कभी देखा मानव मन क्षण की ही प्रतीक्षा करता।

 क्षण की प्रतीक्षा के कारण, कदम नहीं आगे को धरता।

 क्षण भर को ही ध्यान हटा तो, हाथ सदा को रहता मलता।

 हर क्षण को लिखता है विधना, कहां लिखा क्षण उसका टलता।

 सफल वही जीवन क्षण होता, जो क्षण हर पल आस बांधता।

 जिसने जाना मोल है इसका, ईश दिया उपहार मानता।।३।।


 कभी कोई क्षण देरी करके मानव को नवजीवन देता।

 और! कभी क्षण जल्दी आकर मानव का हर जीवन लेता।

 परम सुखी वो ही जन होता, नाम ईश जो हर क्षण लेता।

 बुरे क्षणों को अच्छे क्षण में ईश्वर बदल क्षणों में देता।

 सुख क्षण उससे दूर भागता जो भी क्षण से मिला ठानता ।

 जिसने जाना मोल है इसका, ईश दिया उपहार मानता।।४।।


 कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'

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