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करुणामयी राम - कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण

राम करुण करुणा के सागर करुणा ही बरसाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।


उद्धार धरा का करने को ही राम बने थे अवतारी। 

पापी जन का नाश किया था भक्तों को करुणाकारी। 

अवतारी जन होने पर भी संघर्षी जीवन पाया। 

ऊँच-नीच का भेद भुलाकर सबको उर से अपनाया। 

केवट की मनचाही करने उससे पग धुलवाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।१।।


निषाद राज को मित्र बनाकर उसको मान दिया भारी। 

उसको समझा भ्रातृ भरत सम उनकी है लीला न्यारी। 

कैकेई माँ ने जैसा चाहा बन दिखलाया वनवासी। 

राजमहल का सुख तज कर वो हो गए जैसे संन्यासी। 

इतिहासों में राम मात्र जो ताज त्याग हर्षाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।२।।


दृढ़निश्चय और साहस उनमें पाया भरा निराला था। 

सदा उदारी भाव रहा मन भाव न दूजा पाला था। 

नर लीला में मर्यादा ने मर्यादा उनसे सीखी। 

आदर्शी भैय्या सुत मैत्री मानवता उनमें दीखी। 

गिद्ध जटायु तक का तर्पण कर द्रवित हो जाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।३।।


शबरी जैसी भक्त भीलनी को भी माँ कह हर्षाए। 

हो विनीत उसकी भक्ति से बेर वहाँ झूठे खाए। 

भालू, वानर, भीलों को भी शक्ति उनकी बतलाई।

कौन है ऐसा जिसने महिमा भालू, वानर की गाई। 

अनुपम भक्ति हनुमान की जिसके वो गुण गाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं॥४।।


बना मित्र सुग्रीव को उसके संकट सारे हर डाले।

उसके दुष्ट भाई बालि के प्राण क्षणों में हर डाले। 

संस्कार, सहयोग, समर्पण, संपर्की की कला महा। 

भक्तों को उर में बैठाया भाव दुष्ट को कड़ा रहा! 

मर्यादा को देह रूप में मात्र राम में पाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।५।।


युद्ध हुआ लंका में भारी पर मर्यादा खोई नहीं। 

देख लखन की शक्ति लगना कौन आँख जो रोई नहीं। 

अभिमानी रावण को मारा जीत लंक को दिखलाया। 

लेकिन भाई विभीषण को ही राज लंक का दिलवाया। 

आज कौन जो जीती भूमि दूजों को दे पाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं॥६।।


मर्यादा के लिए कठिनतम निर्णय भी ले दिखलाये। 

सती सिया की अग्नि परीक्षा ले हृदय में दुःख पाए।

इस पर भी दिन ऐसा आया सीता को वनवास दिया। 

महा वेदना और विरह का निज अन्तस को त्रास दिया। 

लोक लाज के लिए नयन में आँसू तक पी जाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।७।।


राम नाम ऐसा व्यापक है जब-जब हिय समाया है। 

मात्र राम का नाम है जिसको जन्म मरण पर गाया है। 

पूर्ण विश्व में कौन देव हैं, जिनका नाम सरल इतना।

जिव्हा पर आकर घुल जाये उसका भाव तरल इतना। 

कलियुग में तो राम नाम से ही मुक्ति पा जाते हैं। 

जो भी उनकी शरण में आया उसको गले लगाते हैं।।८।।

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