समाज में आदर्श किस्म के बालक गिनती के ही दृष्टव्य हो पाते हैं। एक ऐसे ही बालक को, जिसने हर क्षेत्र में स्वयं को अपने अभिभावकों की उम्मीदों के अनुरूप रखने का यथासंभव प्रयास किया, उसके असमय अवसान पर ये श्रद्धा सुमन अर्पित हैं, जो मासिक उलझन सुलझन की अनुग्रह पर सुप्रसिद्ध कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण जी द्वारा रचे गए हैं। इस बालक जितेंद्र का निधन दीपावली पर्व पर हुआ और कुछ माह पूर्व ही इसकी माता जी श्रीमती लक्ष्मी देवी का निधन हुआ था।
'जितेन्द्र' तुमने असमय ही तन ये नश्वर छोड़ डाला।
एक अनचाहे सफर से स्वयं को है जोड़ डाला।
तुम जितेन्द्रिय ही रहे हो, मोह ममता से विलग से,
क्रूर नियति ने प्रकाश पर्व पर सबका हिय तोड़ डाला।
पत्नी 'चित्रा' बन गयी है चित्र जैसी एक मूरत।
जो कभी चहकी कली थी दीखती बिन नूर सूरत।
'सोनू-मोनू' पुत्र दोनो बिलखते से फिर रहे हैं,
पिता 'श्री सरनाम सिंह जी' बन गये एक काठ मूरत।
थी उम्र छोटी तुम्हारी कर्म अनुपम कर दिखाये।
जो मिले भटके तुम्हें थे उनको सच्चे पथ दिखाये।
याद तुमको कर रहे सब जिनका जीवन था संवारा,
तुम में गुण देवों के जैसे जो मिला उसने ही पाये।
स्वयं कर्मठता तुम्हारे हृदय में आकर समाई।
मन समर्पित भावना की महिमा सबने ही गाई।
गुण तुम्हारे परखकर ही ईश ने तुमको बुलाया,
जो किये उपकार तुमने हर किसी ने महक पाई।
तुम सदा सहयोग देकर अपने उर में मुस्कराये।
अहं के कोई भाव तुमको जिंदगी में छू ना पाये।
तुम रहे प्रेरक सभी के, प्रेरणा प्यारी सखी थी,
जिन्दगी में कितने तुमने बुझते दीपक जगमगाए।
जो मिला उसके हृदय में है तुम्हारा वास हर पल।
वास था कल भी तुम्हारा और होगा वास ही कल।
'जितेन्द्र' थे जितेन्द्र बनकर द्युलोकी तुम बनोगे,
याद में कल ही मिलेगी उनको जो होंगे विकल कल।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें