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मान

सृष्टि भर में 'मान' की विशिष्ट भूमिका है। समाज में इसकी विशिष्टी और महत्ता को समझते हुए ही विख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण से इस पर एक काव्य रचना के लिए आग्रह किया गया तो उनके द्वारा रचा काव्यशिल्प कुछ इस रूप में हमारे सामने आया।


इस दुनिया में हर कोई देखा भूखा है सम्मान मान का। 

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।


आधुनिक है चक्र निराला रीत भूल गए आज नमन की। 

नव पीढ़ी में रीत चली है अब तो नूतन नमन चलन की। 

चरणों से उठकर आया है घुटनों तक ये नमन आज का। 

चरणों को छूने में पाया दम्भ भरा-सा भाव लाज का। 

मन में श्रद्धा भावों के बिन अर्थ नहीं है कोई मान का। 

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।।१।।


बड़ा खड़ा है छोटा बैठा, बैठे ही करता अभिवादन।

औपचारिकता मात्र निभाता पाया है उसका अंतर्मन।

नमन हुआ श्रद्धा से तब ही आशीष स्वयं दौड़ा आता है। 

श्रद्धा वाले नमन हेतु तो अहं भाव छोड़ा जाता है। 

मातपिता अरु गुरुजनों का मान स्वयं है भगवन को। 

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।।२।।


धर्म सनातन ने सिखलाया नमन भाव में ईश रमण है। 

ईश्वर भी उससे खुश होते उनकी जो भी स्वयं शरण है। 

भारत भू पर अवतारों ने समय-समय पर जन्म लिया है। 

वन्दन करके गुरुजनों का एक आदर्शी कर्म किया है। 

वन्दन से ही भाव झलकता मानव उर के ज्ञान ध्यान का। 

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।।३।।


नहीं परस्पर मान जहाँ है राग अलापें अपना-अपना। 

इनको केवल अच्छा लगता पूरा होता अपना सपना। 

जहाँ पर मान बड़ों का होता लक्ष्मी करती वास वहीं पर। 

सरस्वती माँ आन विराजे करती है प्रवास वहीं पर। 

धर्मग्रन्थों ने मान सिखाया कर्म नहीं कोई ये विज्ञान का। 

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।।४।।


छोटों का भी मान बड़ों से विनय भाव ही है दर्शाता। 

मान बड़ों का कैसे होता, छोटों को रस्ता दिखलाता। 

मान सदा हृदय से होता दिख जाता मानव आनन पर। 

जैसे कोई सुमन मनोहर छा जाता पावन कानन पर। 

श्रद्धा, भक्ति, भाव, विनय बिन सदा निरर्थक ईश गान का।

लेकिन हर कोई नहीं समझता मोल इसी सम्मान मान का।।५।।

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