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पास मैं पाऊँ! - कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'

भाव भरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत है अपनी दिवंगत अर्धांगिनी को ध्यान में रख रचे जगप्रसिद्घ कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण के भाव पास मैं पाऊँ। 

सांझ सबेरे जब भी बैठूं तुमको अपने पास मैं पाऊँ।

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।


संग तुम्हारे बीता हर पल अब भी मुझको हर्षाता है।                        

वो ही पावन पल अब तुमको पास मेरे लेकर आता है।                     

ये  सब बातें अन्तस में आ मुझको जीने का बल देतीं।                  

जब भी मैं विचलित होता हूँ सम्मुख आकर सम्बल देतीं।                

बात असंभव आज मिलन की फिर भी झूठी आस मैं पाऊँ।  

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।।१।।


तुमको  जब  भी  लिखने  बैठूं  बात स्वयं आ बतियाती है।              

शब्दों  का  भण्डार  अनूठा  पल  में  मुझको  दे  जाती  है। 

मेरे   नयना   नीर   बहाकर    स्याही   नहीं   सूखने   देते। 

सदा   नीर    को   रहें   सहेजे   उसको  नहीं  रूठने  देते। 

मुझको  लगता  वाग्देवी  का  तुमसे  ही  विश्वास मैं पाऊँ।               

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।।२।।  

                                 

डूब  विरह में तुम्हें दुःख दूँ, मुझको यह अधिकार नहीं है। 

दुःख देकर फिर प्यार जताऊँ ये कोई सच्चा प्यार नहीं है। 

भले  नाम  लूँ  सदा  तुम्हारा  नीर  न  नयनों  से  आने दूँ। 

यत्न  यही  है  हर  पल  मेरा  भाव हिय  को  पी  जाने दूँ। 

अन्तस  में  बस  गीत  तुम्हारा अपनी सांस-सांस में गाऊँ। 

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।।३।।  


जब   भी  तुम्हें  पुकारूं  फौरन  तुम  मेरे भावों में आना। 

भले  कहीं  हो  देर  न करना अपना तुम आभास कराना। 

कहाँ  पता  था हमको जग में ऐसा भी निज जीवन होगा। 

दूरी   हो  जाएगी  इतनी  मिलना  सदा  असम्भव   होगा। 

भले  ज्ञान  मैं  अर्जित  कर लूँ पर यादों का दास मैं पाऊँ।

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।।४।।


याद जो तुम दे गयी हो, उसमें ही हर पल विचरता। 

वच्छ जितना है गुजरता उतनी बढ़ती है विका फांकता 

जब भी विगत में मुस्कराती एय दिखी है, लग रही है 

तुम बिना तो हर सफलता ही विफलता।

भावों में यादों की उठती बढ़ती दुगनी प्यास मैं पाऊँ।।४।।


मुक्तक

याद जो तुम दे गयी हो उसमें ही हर पल विचरता। 

वक्त जितना है गुजरता उतनी बढ़ती है विकलता। 

झांकता जब भी विगत में मुस्कराती तुम दिखी है, 

लग रही है तुम बिना तो हर सफलता ही विफलता।



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