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संवाद

संवाद  दो या दो से अधिक लोगों के मध्य लिखित या मौखिक रूप में बातचीत का आदान-प्रदान है। साधारण भाषा में इसको बात करना कहा जाता है; जैसे फ़िल्मों में अथवा धारावाहिक में या किसी बैठक में। और! आपस में विचारों का दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विनिमय भी संवाद कहलाता है। ऐसी प्रक्रिया में वार्ता करने वाला संवाददाता होता है। इसका नवीनतम उदाहरण गत वर्ष दिसंबर में संपन्न एक विशाल सांस्कृतिक महोत्सव में देखने को मिला, जिसमें सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में संलग्न महोत्सव की आयोजन समिति के निर्देशन में डॉ. रीना वर्मा व वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप वर्मा ने 'संवाद-एक सकारात्मक विचार-विनिमय' शीर्षक से वृहद एवं विस्तारित आयोजन में अन्य विविध खंडों के साथ एक चौपाल रूपी मंच का आयोजन भी रखा, जिसका उद्देश्य महोत्सव में सांस्कृतिक तथ्यों के अतिरिक्त कुछ बौद्धिक व सामाजिक परिचर्चाओं को मंच देना और समाज में सार्थक विमर्श में प्रतिभाग करने वालों की तलाश करना था। उनके द्वारा महोत्सव में आने वाले विविध विषय-विशेषज्ञों से उनके विषयों पर विस्तार से बातचीत की गई और सारी वार्ता उसके उपयोगिता को ध्यान में रख सहेजी भी गई। सभी ने इस अद्भुत पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा की और उत्सुकता के साथ संवाद में भाग लेकर भारी संख्या में प्रतिभाग कर रहे श्रोताओं का ज्ञानवर्धन किया। किसी वृहद सांस्कृतिक आयोजन में 'संवाद- एक सकारात्मक विचार-विनिमय' एक शानदार पहल थी, जिसकी सांस्कृतिक महोत्सव में सर्वाधिक चर्चा हुई और यह चौपाल सब ही प्रतिभागियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रही।

अपनी तरह के अनूठे सांस्कृतिक महोत्सव के तत्वावधान में चले इस दो दिवसीय संवाद में नियोजित तरीके से अलग-अलग विषयों को ध्यान में रखकर दस अलग-अलग पैनल बनाये गये थे।

प्रथम दिन 'राष्ट्रीय किसान दिवस' के अवसर पर संवाद क़ी श्रृंखला में चार सत्र क्रमशः विमुक्त जाति, पर्यावरण, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य व महिलाओं की वर्तमान दशा पर आहूत किये गए। दूसरे दिन विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत स्ववित्त पोषित संस्थाओं (N.G.Os) जैसे-ग्राम पाठशाला, विराअंची इंडिया, शाशवत कल्याण ट्रस्ट, मिहिर भोज संस्था, माता पन्ना धाय आदि, स्पोर्ट्स व योगा, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परिदृश्य, शिक्षा के क्षेत्र में भागीदारी व कठिनाइयाँ विषयों पर विचार-विनिमय हुआ।

'संवाद' चौपाल के दोनों सत्र सार्थक विचार-विनिमय के साथ संपन्न हुए। डॉ. रीना जी और एडवोकेट प्रदीप वर्मा जी ने इस बौद्धिक विमर्श को गंभीर सवालों के साथ समाज के लिए सफल ढंग से प्रासंगिक बनाने की महती कोशिश की। चाहे डी.एन.टी. को लेकर चलाये गए सत्र की बात हो और चाहे अरावली पर्वत-श्रृंखला के प्रभावों और परिणामों के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) गाँवों पर असर की। सब ही में प्रशंसनीय चर्चा हुई और ऐसा बिल्कुल भी आभास नहीं हुआ कि इस तरह का आयोजन प्रथम बार हो रहा है। 

संवाद की इन द्वि-सत्रीय चर्चाओं में डाॅ. जावेद राही जी (जम्मू), मोहित तोमर जी, प्रदीप जी, डाॅ. अनिल (जे.एन.यू.), डॉ. जगराम सिंह, महावीर जी (राजस्थान), डॉ. राकेश राणा (गाज़ियाबाद), डॉ. आर. सी. सिंह, सत्येंद्र आर्य , कैलाश चौधरी, डाॅ. तनवी भाटी, डाॅ. गौरव (डी.यू.), लाल बहार जी, राजकुमार राजन (कोच), राजीव विकल, जितेन्द्र भडाना , रोहिताश चौधरी, निर्मल डेढा, अर्जुन कसाना, नूतन भाटी, करनैल सिह से विचार विनिमय हुआ। विनीत चौधरी, डॉ. विरेन्द्र, डाॅ. निकिता व दिवाकर विधूडी, नीतू भडाना, डाॅ. सुशील भाटी, विजयपाल कसाना व खविंदर चौधरी का भी विशेष सहयोग रहा।

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